बुधवार की आधी रात के बाद भारत और ब्रिटेन के बीच शुल्क की दीवार गिरनी शुरू हो जाएगी। भारत–ब्रिटेन व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA) 15 जुलाई से लागू होगा, और उसी क्षण ब्रिटेन भारत की लगभग 99% टैरिफ मदों पर सीमा शुल्क हटा देगा। तिरुपुर की एक कपड़ा इकाई, आंध्र प्रदेश के एक झींगा-निर्यातक या पुणे के एक कल-पुर्ज़ा निर्माता के लिए, ब्रिटेन का बाज़ार रातोंरात सस्ता हो जाएगा।
समझौते की बनावट जान-बूझकर उन क्षेत्रों के पक्ष में है जो सबसे अधिक रोज़गार देते हैं। कुछ प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर 70% तक, समुद्री उत्पादों पर करीब 21.5%, इंजीनियरिंग सामान व वाहन-कलपुर्ज़ों पर 18%, चमड़ा व जूता-चप्पल पर 16%, तथा वस्त्र व परिधान पर 12% शुल्क समाप्त हो रहा है। बदले में भारत अपनी करीब 90% मदों को चरणबद्ध ढंग से खोलेगा, जिसमें संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को सुरक्षा मिली रहेगी।
समझौते पर हस्ताक्षर मंत्री करते हैं, पर उसका उपयोग छोटे उद्यम करते हैं। बुधवार श्रम-प्रधान निर्यातकों को असली मूल्य-बढ़त देता है; अब काम उन्हें उसे भुनाने में मदद करना है।
समझौते के साथ एक दोहरा-अंशदान समझौता (DCC) भी आता है, जो सेवा-निर्यातकों की एक चुपचाप पर महँगी अड़चन हटाता है: ब्रिटेन में अस्थायी तैनाती पर गए भारतीय पेशेवरों को अब दोनों देशों में सामाजिक-सुरक्षा अंशदान नहीं देना होगा, और यह छूट तीन से बढ़ाकर पाँच वर्ष कर दी गई है। सीमापार आवाजाही पर टिके आईटी और परामर्श उद्योग के लिए यह सीधी बचत है।
रचनात्मक कार्य अब बातचीत से क्रियान्वयन की ओर बढ़ता है, क्योंकि पहुँच तभी ऑर्डर बनती है जब एक मँझोली इकाई उसका वास्तव में उपयोग कर सके। इसका अर्थ है — स्पष्ट मूल-प्रमाणन (rules of origin) मार्गदर्शन, मानकों की पारस्परिक मान्यता, और व्यापार-वित्त जो सबसे बड़ी कंपनियों से आगे पहुँचे। ब्रिटेन तो एक शृंखला की पहली कड़ी है — अमेरिका के साथ अंतरिम समझ 24 जुलाई की समय-सीमा से पहले क़रीब बताई जा रही है, और भारत–यूरोपीय संघ समझौता हस्ताक्षर की ओर बढ़ रहा है।














