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किसी भी अंतरिक्ष कार्यक्रम की असली परख सफल उड़ानों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह असफलता के बाद कैसे लौटता है। भारत का कार्यक्रम इस समय ठीक इसी दौर में है। तीन दशकों से देश के अधिकांश उपग्रह ढोने वाले भरोसेमंद रॉकेट पीएसएलवी की इस वर्ष जनवरी में हुई पहली उड़ान में तीसरे चरण में खराबी आई थी, और तब से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने पुनर्परीक्षण, जाँच और — सरकार के अनुसार — कुछ अहम कलपुर्ज़ों के आपूर्तिकर्ता बदलने में महीने लगाए हैं, ताकि सुधार पक्का रहे।
दाँव केवल भावनात्मक नहीं है। इसरो ने 2026 के लिए करीब 18 प्रक्षेपणों का भरा-पूरा कार्यक्रम तय किया है, जिनमें कई निजी भारतीय अंतरिक्ष कंपनियों के पेलोड भी शामिल हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह के अनुसार, इसरो वर्ष के मध्य के आसपास पीएसएलवी की “वापसी उड़ान” का लक्ष्य रखे हुए है — इस मिशन को महज़ एक सामान्य उड़ान नहीं, बल्कि देश-विदेश के ग्राहकों के लिए भरोसा बहाल करने का एक सार्वजनिक कदम माना जा रहा है।
एक भरोसेमंद रॉकेट राष्ट्रीय अवसंरचना है। पीएसएलवी को फिर साफ़-सुथरी उड़ान पर लाना भारत के लिए किसी नए मिशन जितना ही मायने रखता है।
आगे की योजना सचमुच महत्वाकांक्षी है। कार्यक्रम में ऊपर है GISAT-1A — एक भू-स्थिर कक्षा में बैठकर उपमहाद्वीप पर लगभग निरंतर नज़र रखने वाला भू-प्रेक्षण उपग्रह, जो चक्रवात या बाढ़ के समय आपदा-प्रतिक्रिया को तेज़ करता है। इससे आगे हैं TRISHNA — फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी CNES के साथ मिलकर बनाया गया तापीय-प्रतिबिंब उपग्रह, जो जल-तनाव और भू-सतह तापमान मापेगा — और मानवयुक्त गगनयान कार्यक्रम, जिसकी शेष मानवरहित परीक्षण उड़ानें इसरो इसी वर्ष पूरी करना चाहता है।
ईमानदार तस्वीर एक ऐसे कार्यक्रम की है जो एक झटके को सार्वजनिक रूप से आत्मसात कर रहा है — और यही खुलापन अपने आप में एक ताक़त है। रचनात्मक पाठ यह है कि भारत के पास प्रक्षेपण की रफ़्तार, गहरी इंजीनियरिंग प्रतिभा और अब बढ़ता निजी उद्योग है; यहाँ से हर सावधान, सफल उड़ान उस विश्वसनीयता को फिर बनाती है जिस पर एक बड़ी अंतरिक्ष-अर्थव्यवस्था खड़ी होगी। राह तमाशे से नहीं, धैर्य से बनेगी: उड़ो, सिद्ध करो, दोहराओ।














