ब्लिट्ज ब्यूरो
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) का अनुमान है कि इस जुलाई में देशव्यापी वर्षा दीर्घावधि औसत के 94% से नीचे रहेगी — जो सामान्य वर्ष में लगभग 280 मिलीमीटर होता है। तस्वीर असमान है: उत्तर-पश्चिम, पूर्वोत्तर, पूर्व-मध्य भारत के हिस्से और पूर्वी प्रायद्वीप में सामान्य या उससे अधिक वर्षा की संभावना है, जबकि शेष अधिकांश क्षेत्र थोड़ा सूखा रहेगा।
फिर भी सरकार का अपना आकलन आश्वस्त करने वाला है। वित्त मंत्रालय की ताज़ा मासिक समीक्षा कहती है कि व्यापक सिंचाई, बेहतर कृषि-पद्धतियों और जलवायु-सहनशीलता में वर्षों के निवेश के चलते भारत की अर्थव्यवस्था अब कमज़ोर मानसून के प्रति पहले से कहीं कम संवेदनशील है। शुरुआती ख़रीफ़ बुआई पिछले वर्ष से पीछे है क्योंकि किसान बारिश के जमने का इंतज़ार कर रहे हैं, पर अनाज भंडार पर्याप्त हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पहले के सूखे वर्षों से अधिक विविध है।
हल्के मानसून और कठिन वर्ष के बीच की खाई सिंचाई, अनाज भंडार और सहनशील फसलों से भरती है — और यह खाई भारत के पक्ष में चौड़ी होती जा रही है।
एक नज़र में
- जुलाई अनुमान: दीर्घावधि औसत के 94% से नीचे
- असमान वितरण: उत्तर-पश्चिम, पूर्वोत्तर, पूर्व-मध्य अधिक; शेष कम
- निगरानी: शुरुआती ख़रीफ़ बुआई पिछले वर्ष से पीछे; अधिक गर्मी
- प्राथमिकता: जल-संरक्षण व जलवायु-सहनशील फसलें
रचनात्मक राह वही है जो समीक्षा स्वयं सुझाती है: पानी का सघन संरक्षण — जल जीवन मिशन के तहत आवंटन का पुनर्चक्रण और पूरा उपयोग सहित — और कम पानी माँगने वाली, जलवायु-सहनशील फसलों की ओर रुख़। कम वर्षा वाले ज़िले सिंचाई और भंडारित अनाज पर निर्भर रहें, जबकि भारी वर्षा वाले क्षेत्र जल-निकासी और सुरक्षित भंडारण को प्राथमिकता दें।
आने वाले हफ़्तों में इस रणनीति को ठीक से लागू किया जाए, तो एक कठिन पूर्वानुमान भी सहनशीलता का प्रमाण बन सकता है। IMD की वास्तविक-समय सलाह, आश्वस्त सिंचाई और अच्छा बीज उन खेतों तक पहुँचाना जिन्हें इनकी सबसे अधिक ज़रूरत है — यही वह तरीक़ा है जिससे भारत असमान मौसम को संभालने योग्य बनाता है और बारिश के भरने तक ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिर रखता है।











