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‘बिल्डर से होम लोन के ब्याज की मांग नहीं कर सकते मकान खरीदार’

- सुप्रीम कोर्ट से खरीदारों को बड़ा झटका

by ब्लिट्ज़ इंडिया
June 20, 2025
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने घर खरीदने वालों को बड़ा झटका दिया है। इसके तहत अब घर खरीदार डेवलपर से होम लोन पर दिए गए ब्याज को वापस करने के लिए नहीं कह सकता है। कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी प्रोजेक्ट में देरी होती है और खरीदार रिफंड मांगता है, तो वह डेवलपर से होम लोन पर दिए गए ब्याज को वापस करने के लिए नहीं कह सकता।
कोर्ट के अनुसार, खरीदार को सिर्फ वही पैसा वापस मिलेगा जो उसने कंपनी को दिया था। साथ ही, उसे समझौते के अनुसार उस राशि पर ब्याज के रूप में ‘मुआवजा’ मिलेगा। इसका मतलब है कि आप लोन पर दिए गए ब्याज को अलग से नहीं मांग सकते।
उपभोक्ता अदालत के आदेश को किया रद
सुप्रीम कोर्ट ने एक उपभोक्ता अदालत के आदेश को रद कर दिया। उस आदेश में ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (जीएमएडीए) को यह निर्देश दिया गया था कि वह एक घर खरीदार को होम लोन पर दिया गया ब्याज भी वापस करे। इसके साथ ही, उसे मूल राशि पर 8% ब्याज भी देना था।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की बेंच ने कहा कि नुकसान की भरपाई के लिए कई अलग-अलग तरीके नहीं हो सकते। खरीदार और बिल्डर के बीच जो समझौता हुआ है, उससे ज्यादा ब्याज और मुआवजा नहीं दिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जीएमएडीए को होम लोन पर ब्याज देने का कोई खास या मजबूत कारण नहीं है। इसका मतलब है कि कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि हर मामले में अलग-अलग नियम नहीं बनाए जा सकते।
खरीदार पैसे कहां से लाए इससे डेवलपर को कोई मतलब नहीं
बेंच ने कहा कि चाहे फ्लैट खरीदने वाले अपनी बचत का इस्तेमाल करें, लोन लें या किसी और तरीके से पैसे जुटाएं, यह बात प्रोजेक्टबनाने वाले को ध्यान में रखने की जरूरत नहीं है। इसका मतलब है कि डेवलपर को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि खरीदार ने पैसे कहां से लाए।
कोर्ट ने आगे कहा कि उनके लिए यह विचार अप्रासंगिक है। फ्लैट खरीदने वाला एक उपभोक्ता है और फ्लैट बनाने वाला एक सेवा प्रदाता है। दोनों के बीच यही रिश्ता है। इसका मतलब है कि खरीदार और बिल्डर के बीच सिर्फ एक ग्राहक और सेवा देने वाले का संबंध है।
सेवा में कमी होने पर उपभोक्ता को उसका मुआवजा पाने का हक
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर सेवा में कोई कमी है या देरी होती है, तो उपभोक्ता को उसका मुआवजा पाने का हक है। पूरी मूल राशि 8% ब्याज के साथ वापस करना, जैसा कि अनुबंध में तय है, और यह स्पष्ट करना कि प्राधिकरण पर कोई और देनदारी नहीं होगी, यह आवश्यकता को पूरा करता है। इसका मतलब है कि अगर बिल्डर ने समय पर घर नहीं दिया, तो उसे समझौते के अनुसार मुआवजा देना होगा।
इस मामले में, पंजाब राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने जीएमएडीए को निर्देश दिया था कि वह 41 लाख रुपये की पूरी राशि 8% ब्याज के साथ वापस करे। इसके अलावा, खरीदार को मानसिक तनाव और परेशानी के लिए 60,000 रुपये का मुआवजा भी देना था। साथ ही, खरीदार ने होम लोन पर जो ब्याज दिया था, उसे भी वापस करना था।
कोर्ट ने कहा कि एक बार जब पार्टियां देरी होने पर किसी खास परिणाम पर सहमत हो जाती हैं, तो समझौते में तय की गई दर से ज्यादा मुआवजा देने के लिए असाधारण और मजबूत कारण होने चाहिए। इसका मतलब है कि अगर आपने पहले से ही समझौते में मुआवजे की राशि तय कर ली है, तो उसे बदलने के लिए आपके पास बहुत ही खास वजह होनी चाहिए।

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