नई दिल्ली। कुछ सपने ऐसे होते हैं, जिन्हें हालात बार-बार तोड़ने की कोशिश करते हैं लेकिन हौसला हर बार फिर खड़ा कर देता है। उम्मुल खेर की कहानी भी ऐसी ही संघर्ष, दर्द और जिद की है। बचपन में झुग्गी में रहकर जिंदगी की कठिनाइयों को करीब से देखने वाली उम्मुल के सामने चुनौतियां कम नहीं थीं। हड्डियों की बीमारी ने उन्हें बेड़ियों में कैद कर दिया लेकिन मुश्किलों के बीच भी उन्होंने पढ़ाई को अपना सहारा बनाया। पहले ही प्रयास में यूपीएससी क्रैक करके आईआरएस अफसर बनीं। उनकी सक्सेस स्टोरी अंधेरे को चीरकर उजाला बिखेरने की दास्तां बयां करने के साथ सोच बदलने वाली है।
हड्डियों की बीमारी, प्लास्टर की कैद
उम्मुल खैर का बचपन किसी जंग से कम नहीं था। वह वीडियो इंटरव्यू में बताती हैं कि उन्हें ऑस्टियोजेनेसिस इमपरफेक्टा नाम की दुर्लभ बीमारी थी। इसके कारण इनकी हड्डियां कांच की तरह नाजुक थीं और बहुत जल्द टूट जाती थीं। उनके जीवन का बड़ा हिस्सा प्लास्टर में ही बीता। इसके बाद भी उन्होंने अपनी शारीरिक सीमाओं को बाधा नहीं बनने दिया और पढ़ाई के लिए समर्पित रहीं।
वह बताती हैं कि आर्थिक स्थिति बहुत खराब होने के कारण उन्हें अपने जीवन के कुछ साल दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन के पास एक झुग्गी बस्ती में बिताने पड़े। परिवार की जिम्मेदारियां उठाने के लिए उन्होंने स्कूल के दिनों से ही अन्य बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था। आर्थिक अभावों ने उन्हें कभी निराश नहीं किया, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में जीना और मेहनत करना सिखाया। यहीं से सफलता का सफर शुरू हुआ था।
पहले ही प्रयास में निकाला यूपीएससी
उन्होंने अपनी मेहनत और अनुशासन से यह सफलता हासिल की। साउथ कोरिया में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए वीजा न मिलने की स्थिति में भी उन्होंने हार नहीं मानी। उनकी यह कहानी हर एस्पिरेंट के लिए मिसाल है कि हार केवल तब होती है जब आप प्रयास करना बंद कर देते हैं।
जेएनयू से पढ़ाई, फेलोशिप पाई
उम्मुल ने यूपीएससी की तैयारी के लिए कई निर्णय लिए। उन्होंने अपनी पढ़ाई के खर्च और समय को संतुलित करने के लिए अपनी पसंदीदा क्लीनिकल साइकोलाॅजी छोड़कर जेएनयू से इंटरनेशनल स्टडीज को चुना। इस दौरान उन्होंने जेआरएफ फेलोशिप हासिल की। इससे उन्हें यूपीएससी की तैयारी के लिए आर्थिक सहारा मिला। यह उनकी दूरगामी सोच का परिणाम था कि उन्होंने अपने भविष्य के लक्ष्य को प्राथमिकता दी।
‘दर्दनाक बेड़ियां’
उम्मुल ने चलने-फिरने के लिए 10 साल तक पैरों में भारी और दर्दनाक प्लास्टिक के ब्रेसेस पहने। वह बताती हैं कि ‘दर्दनाक बेड़ियों’ की कैद के बाद भी उन्होंने अनुशासन नहीं तोड़ा। ब्रेसेस उनकी त्वचा को छील देते थे और बहुत कष्ट होता था लेकिन वह काॅलेज जाती रहीं। यह उनके दृढ़ संकल्प को दिखाती है।














