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वायु प्रदूषण से घिरा आसमान

हर साल घट रही धरती पर आने वाली सोलर किरणें

by ब्लिट्ज़ इंडिया
October 4, 2024
in the blitz
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ब्लिट्ज ब्यूरो

पुणे। धरती पर आने वाली सूरज की किरणों से लोगों को ऊर्जा मिलती है। सोलर रेज शरीर के लिए जरूरी है। हालांकि एक डराने वाली खबर भी सामने आई है। एक नई स्टडी में पाया गया है कि 1993 से पुणे में सोलर किरणों का आना 0.21 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से घट रहा है। इससे भी बुरी बात यह है कि 2018 और 2022 के बीच, प्रति वर्ष 1.21 प्रतिशत की तीव्र गिरावट पाई गई, जिससे कई चिंताएं पैदा हुईं हैं।
कम धूप के संपर्क में आने से लोगों में विटामिन डी का स्तर घट रहा है। ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील और यूएसए में पहले किए गए अध्ययनों से पता चला है कि कम धूप से खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करने के अलावा फसल की पैदावार और गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।

किसने किया अध्ययन
वायु प्रदूषण से जुड़े बादल और एरोसोल (धूल और प्रदूषक) इस सौर मंदता के मुख्य कारण हैं। यह अध्ययन सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय (एसपीपीयू), भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) और आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान के शोधकर्ताओं ने किया। इसे पूरा करने में तीन दशक लगे हैं।

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दिल्ली, मुंबई और अहमदाबाद का हाल
अध्ययन से पता चला कि बादलों ने सौर किरणों को लगभग 30 प्रतिशत कम कर दिया है। वहीं एरोसोल के कारण साफ आसमान की स्थिति में लगभग 18प्रतिशत की कमी आई है। हालांकि यह अध्ययन पुणे पर केंद्रित था, भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने इस वर्ष की शुरुआत में नई दिल्ली, मुंबई और अहमदाबाद सहित 33 शहरों में किए गए एक अन्य अध्ययन में 1985 और 2019 के बीच वैश्विक विकिरण में इसी तरह की कमी पाई है। वैश्विक विकिरण पृथ्वी की सतह पर प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा की कुल मात्रा को संदर्भित करता है।
आईएमडी के वैज्ञानिक डॉ. सुदीप कुमार ने बताया, ‘हमारे अध्ययन में नई दिल्ली, शिलांग, अहमदाबाद, कोलकाता, नागपुर, मुंबई, पुणे, विशाखापत्तनम, गोवा, चेन्नई और तिरुवनंतपुरम में वैश्विक विकिरण में उल्लेखनीय कमी पाई गई। इन स्टेशनों में, नई दिल्ली (0.7 प्रतिशत) में अधिकतम कमी और पुणे (0.1 प्रतिशत) में न्यूनतम कमी देखी गई।’

सोलर पैनल की दक्षता हो सकती है कम
वैज्ञानिकों ने कहा कि सोलर किरणों में कमी से सौर पैनलों की दक्षता में भी उल्लेखनीय गिरावट आ सकती है। इसका मतलब है कि मौजूदा सौर प्रतिष्ठान शुरू में अनुमानित की तुलना में कम बिजली का उत्पादन कर सकते हैं। एसपीपीयू के शोधकर्ता अश्विन जाधव नवीनतम अध्ययन का हिस्सा थे। उन्होंने कहा, ‘कुल गिरावट सालाना ~1.04 W/m² (वाट प्रति वर्ग मीटर) है, जिसमें 2018 और 2022 के बीच ~6.01 W/m² की अधिक स्पष्ट कमी है।’ उन्होंने कहा कि पुणे क्षेत्र में कुल बादल कवर और एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ में वृद्धि इस तीव्र गिरावट के पीछे एक प्रमुख कारक है।

डराने वाला डाटा
एसपीपीयू संकाय के डॉ रोहिणी भवर ने कहा कि कम एरोसोल सांद्रता सौर विकिरण के अधिक प्रत्यक्ष संचरण की अनुमति देती है, जबकि उच्च सांद्रता विकिरण के स्तर को काफी कम कर देती है। उन्होंने कहा, ‘मौसमी सौर किरणों का डेटा दिखाता है कि एरोसोल की उपस्थिति सूर्य के प्रकाश को कैसे प्रभावित करती है, 2018 से 2022 के दौरान स्पष्ट-आसमान की स्थिति की तुलना में विकिरण के स्तर में 23.51 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। यह कमी भारत, चीन और अरब प्रायद्वीप के अन्य क्षेत्रों में देखी गई प्रवृत्तियों के बराबर है, जहां एरोसोल के कारण सौर विकिरण में भी गिरावट आई है।’
स्टडी में वायु की गति के प्रभाव पर भी चर्चा की गई, जो वायुमंडलीय अशांति में योगदान दे सकती है और धूल- एरोसोल के वितरण को प्रभावित कर सकती है। शोधकर्ताओं ने वायु प्रदूषण को कम करने और एरोसोल के प्रबंधन के लिए कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया है। इसके साथ ही सौर ऊर्जा प्रणालियों को कम होते सौर संसाधन उपलब्धता के अनुकूल बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

– सावधान हो जाइए नहीं तो भुगतेंगे अंजाम

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