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ग्रामीण बैंकों का कर्ज़ 5.78 लाख करोड़ के पार

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 19, 2026
in the blitz
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nirmala sitharaman

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों ने साल भर में 10.3 फ़ीसदी ज़्यादा कर्ज़ बाँटा। आँकड़े को खोलिए तो एक और बात निकलती है — इनके हर रुपये में क़रीब 85 पैसे प्राथमिकता क्षेत्र का कर्ज़ है।

वित्त मंत्रालय ने 19 अगस्त को बताया कि 2025-26 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों यानी आरआरबी ने कर्ज़ देने में मज़बूत बढ़ोतरी दर्ज की। बकाया कुल कर्ज़ 10.3 फ़ीसदी बढ़कर 5 लाख 78 हज़ार करोड़ रुपये से ऊपर पहुँच गया, जो 2024-25 में क़रीब 5 लाख 24 हज़ार करोड़ रुपये था। खेती और उससे जुड़े कामों का हिस्सा सबसे बड़ा रहा — 3.78 लाख करोड़ रुपये, जो इन बैंकों के प्राथमिकता क्षेत्र कर्ज़ का 77 फ़ीसदी है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को क़रीब 67 हज़ार करोड़ रुपये का कर्ज़ गया।

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अब हिसाब लगाइए। अगर 3.78 लाख करोड़ रुपये प्राथमिकता क्षेत्र कर्ज़ का 77 फ़ीसदी है, तो पूरा प्राथमिकता क्षेत्र कर्ज़ क़रीब 4.91 लाख करोड़ रुपये बैठता है — यानी 5.78 लाख करोड़ के कुल कर्ज़ का लगभग 84.9 फ़ीसदी। अकेली खेती कुल कर्ज़ का क़रीब 65 फ़ीसदी है। यह हिसाब विज्ञप्ति में नहीं लिखा, पर उसी के आँकड़ों से निकलता है।

आँकड़े जारी करने वाला मंत्रालय: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण। उनके मंत्रालय के अधीन वित्तीय सेवाएँ विभाग क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक व्यवस्था का प्रशासनिक ज़िम्मेदार है, जिसका 2025-26 का प्रदर्शन 19 अगस्त 2026 को जारी हुआ।

इन बैंकों के हर रुपये में क़रीब 85 पैसे प्राथमिकता क्षेत्र का कर्ज़ है, और क़रीब 65 पैसे अकेली खेती का। यानी यह गाँव में खुला व्यावसायिक बैंक नहीं — यह मूलतः खेती का बैंक है, जो बाक़ी काम भी करता है।

एक नज़र में

• कुल बकाया कर्ज़ 2025-26: 5.78 लाख करोड़ रुपये से ऊपर
• कुल बकाया कर्ज़ 2024-25: क़रीब 5.24 लाख करोड़ रुपये
• बढ़ोतरी: 10.3 फ़ीसदी
• खेती और सहायक काम: 3.78 लाख करोड़ रुपये — प्राथमिकता क्षेत्र कर्ज़ का 77%
• अनुमानित प्राथमिकता क्षेत्र कर्ज़: क़रीब 4.91 लाख करोड़ रुपये
• कुल कर्ज़ में इसका हिस्सा: क़रीब 84.9% (ब्लिट्ज़ गणना)
• एमएसएमई कर्ज़: क़रीब 67 हज़ार करोड़ रुपये
• स्रोत: वित्त मंत्रालय, 19 अगस्त 2026

यह एकाग्रता ताक़त भी है और जोखिम भी। ताक़त इसलिए कि ये बैंक बने ही इसी काम के लिए थे — औपचारिक कर्ज़ को उन इलाक़ों और उन क़र्ज़दारों तक पहुँचाना जहाँ आम बैंक शाखा खोलना घाटे का सौदा मानता है। 85 फ़ीसदी प्राथमिकता क्षेत्र का पोर्टफ़ोलियो बताता है कि यह काम हो रहा है। रिज़र्व बैंक के प्राथमिकता क्षेत्र कर्ज़ ढाँचे पर इनका प्रदर्शन साल भर मज़बूत रहा, यह मंत्रालय ने ख़ुद कहा है।

जोखिम इसलिए कि इतना एकाग्र कर्ज़ मूलतः एक ही मौसम से बँधा होता है। बारिश कमज़ोर रही, किसी एक फ़सल समूह के दाम गिरे, या ख़रीद देर से हुई — तो असर पूरे नेटवर्क पर एक साथ पड़ता है। यह खेती को कर्ज़ देने के ख़िलाफ़ तर्क नहीं है। यह दूसरे पैर की ज़रूरत का तर्क है। और वह दूसरा पैर एमएसएमई है।

क़रीब 67 हज़ार करोड़ रुपये पर एमएसएमई कर्ज़ अभी छोटा है, पर तेज़ी से बढ़ने की गुंजाइश वहीं है। गाँव-क़स्बे के छोटे उद्यम का कर्ज़ अलग तरह का होता है — उसकी आमदनी महीने-दर-महीने आती है, फ़सल के मौसम पर नहीं टिकती, और वह स्थानीय बाज़ार से जुड़ी होती है। यही वह रास्ता है जिससे कोई ग्रामीण बैंक अपना ज़िला छोड़े बिना जोखिम फैला सकता है। मंत्रालय ने भी माना है कि एमएसएमई कर्ज़ ग्रामीण उद्यमिता और रोज़गार में इन बैंकों की अहम भूमिका दिखाता है। आगे का सही क़दम यह होगा कि उन 67 हज़ार करोड़ रुपये का ब्योरा दिया जाए — कितना छोटे टिकट का कर्ज़ है और कितना पहली बार कर्ज़ लेने वालों को गया। पुराने व्यापारी को दोबारा कर्ज़ देना और नए सूक्ष्म उद्यम को औपचारिक बनाना, दोनों में यही फ़र्क़ है।

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