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बार पर रजत, स्नैच में रिकॉर्ड: ग्लासगो में चढ़ता गया भारत का पदक-हिसाब

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 27, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को रविवार को लय मिल गई। ऋषिकांत सिंह चनंबम ने पुरुषों के 60 किग्रा भारोत्तोलन में 264 किग्रा के कुल भार के साथ रजत पदक जीता — मलेशिया के मोहम्मद अनीक बिन कसदान के पीछे रहकर — और वह भी एक ख़ास अंदाज़ में: 121 किग्रा का स्नैच उठाकर उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों का नया रिकॉर्ड बना दिया। कुछ घंटे बाद उसी मंच पर ओलंपिक पदक विजेता मीराबाई चानू ने महिलाओं के 48 किग्रा फ़ाइनल की शुरुआत ही राष्ट्रमंडल स्नैच रिकॉर्ड तोड़ते हुए की — एक बार चूकने के बाद 85 किग्रा उठाकर।

खाता शुक्रवार को पैरा पावरलिफ़्टर झंडू कुमार ने खोला था, जिन्होंने पुरुषों के हैवीवेट वर्ग में दूसरे प्रयास में 190 किग्रा उठाकर कांस्य जीता — भारत का इन खेलों का पहला पदक और सबसे भावुक कर देने वाली कहानियों में से एक। 28 साल के झंडू कुमार एक सब्ज़ी विक्रेता के बेटे हैं, ऑटो-रिक्शा चलाते थे, और 2023 में राष्ट्रीय चैंपियनशिप तक पहुंचने के लिए उन्होंने वही ऑटो बेच दिया जो उनकी रोज़ी थी। रविवार शाम तक इस कांस्य के साथ भारोत्तोलन, जिम्नास्टिक और तैराकी में मेहनत से बटोरे अंक भी जुड़ चुके थे।

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बहु-खेल रविवार: तपन मोहंती के पुरुष कलात्मक ऑल-अराउंड फ़ाइनल के साथ भारत का चौथा दिन आगे बढ़ा — भारोत्तोलन में ऋषिकांत सिंह का 60 किग्रा रजत (गेम्स स्नैच रिकॉर्ड) और मीराबाई चानू का 85 किग्रा स्नैच का राष्ट्रमंडल रिकॉर्ड।

रिकॉर्ड बार पर बनते हैं, पर बनते छोटे शहरों के अखाड़ों और लंबे सफ़र में हैं। ग्लासगो में टूटा हर रिकॉर्ड घर पर की गई बरसों की मेहनत की रसीद है।

एक नज़र में

• रजत: ऋषिकांत सिंह, पुरुष 60 किग्रा भारोत्तोलन, 264 किग्रा — स्नैच में गेम्स रिकॉर्ड 121 किग्रा
• रिकॉर्ड: मीराबाई चानू, महिला 48 किग्रा फ़ाइनल में 85 किग्रा स्नैच का राष्ट्रमंडल रिकॉर्ड
• पहला पदक: झंडू कुमार, कांस्य, पुरुष हैवीवेट पैरा पावरलिफ़्टिंग (190 किग्रा)
• आज रात: मुक्केबाज़ी में भारत-पाकिस्तान भिड़ंत — जदुमणि सिंह, पुरुष 55 किग्रा

दिन देर तक चलते हुए एक जानी-पहचानी टक्कर अभी बाक़ी है। अपने पहले मुक़ाबले में 5-0 से दमदार जीत दर्ज करने वाले मुक्केबाज़ जदुमणि सिंह मंडेंगबम पुरुषों के 55 किग्रा में पाकिस्तान के सुमामा रहमान से भिड़ेंगे — वही भारत-पाकिस्तान मुक़ाबला जो अखाड़ा और बैठक दोनों भर देता है। रविवार को ही जिम्नास्ट तपन मोहंती पुरुष ऑल-अराउंड फ़ाइनल में उतरे और भारतीय तैराक रिले में जगह के लिए ज़ोर लगाते रहे — एक ऐसा अभियान जो अब किसी एक नतीजे पर टिका नहीं है।

सकारात्मक बात पदक तालिका से ज़्यादा उस रास्ते की है जो इन पदकों तक पहुंचाता है। भारत का पहला पदक पैरा खेल से आना और भारोत्तोलकों का सिर्फ़ फ़ाइनल तक पहुंचने के बजाय रिकॉर्ड तोड़ना उस बदलाव का सबूत है जिसमें बीते एक दशक में लगातार फंडिंग, कोचिंग और प्रतिभा-पहचान देश के भीतर तक पहुंची है। आगे का काम है झंडू कुमार की कहानी को अपवाद न रहने देना — ताकि किसी राष्ट्रीय चैंपियनशिप तक पहुंचने के लिए फिर कभी घर की कमाई का साधन न बेचना पड़े — और छोटे शहरों के अखाड़ों तथा यात्रा-मदद में निवेश जारी रखना, जो एक होनहार दांव को ग्लासगो के पोडियम में बदलते हैं।

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