लेह। ऊंचे पहाड़ों के बीच ठंडी हवा चल रही है। सामने अब तक बंजर पड़ी क्यारियां हैं और उन्हीं में मिट्टी के भीतर चुपचाप 90 हजार केसर के कंद सांस ले रहे हैं। तीन महीने पहले तक जिस जमीन पर खेती की कल्पना भी मुश्किल थी, वहां अब किसान और कृषि विशेषज्ञ पहली फसल का इंतजार कर रहे हैं। लद्दाख में पहली बार केसर की खेती का प्रयोग सफल रहा तो बंजर धरा केसर की खुशबू से गमक उठेगी और किसान समृद्धि की राह पर तेजी से बढ़ चलेंगे।
स्पितुक फारका के कमांड एरिया में गेट नंबर-27 के पास करीब 4,000 वर्गमीटर जमीन पर 90 हजार ईरानी केसर के कंद रोपे गए हैं। इन कंदों का कुल वजन करीब 800 किलो है। यानी औसतन हर वर्गमीटर में करीब 22-23 कंद। अब असली परीक्षा लद्दाख की जमीन और मौसम की है। बड़ा सवाल यही है कि क्या इस ठंडे रेगिस्तान में भी केसर अपनी पहचान बना पाएगा? कंद के चयन में भी खास सावधानी बरती गई है। 8 से 10 सेंटीमीटर परिधि, 2.5 से तीन सेंटीमीटर या उससे अधिक व्यास और कम से कम 10 ग्राम वजन वाले उच्च गुणवत्ता के ईरानी कंद लगाए गए हैं।














