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तीन समझौते, तीन रफ्तार: ब्रिटेन से रास्ता खुला, यूरोप करीब, अमेरिका छह दिन की घड़ी पर

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 18, 2026
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पश्चिम एशिया संकट ने चुपचाप बदल दिया भारत के व्यापार का नक्शा

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।भारत के व्यापार का सबसे बड़ा दांव इस वक्त तीन मोर्चों पर एक साथ चल रहा है, और घड़ी की सुई तेज़ हो रही है। ब्रिटेन के साथ समझौता (CETA) लागू हो चुका है और पहले ही दिन इससे 14 करोड़ डॉलर से ज़्यादा का सामान बिना टैक्स के ब्रिटेन गया। यूरोपियन यूनियन के साथ समझौता — जो सबसे बड़ा है — अब कानूनी जांच के आखिरी दौर में है। और अमेरिका के साथ पहले चरण का समझौता बस “आखिरी एक फीसदी” पर अटका है, जहां अंतरिम टैरिफ राहत करीब 24 जुलाई को, यानी अब बस छह दिन में खत्म होने वाली है।

तीनों समझौते अलग-अलग पड़ाव पर हैं, और यही फर्क समझने लायक है। ब्रिटेन वाला समझौता सबूत है — 15 जुलाई से इसने भारतीय कपड़े पर लगने वाला 12% ब्रिटिश टैक्स एक झटके में हटा दिया, और पहले दिन कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयां और जेम्स-ज्वेलरी की खेपें देश की 20 से ज़्यादा जगहों से रवाना हुईं। यूरोप वाला समझौता सबसे बड़ा बाज़ार है, जो अब दस्तखत से पहले की कानूनी जांच में है — सरकारी अनुमान के मुताबिक इससे करीब 75.85 अरब डॉलर के भारतीय निर्यात को रफ्तार मिल सकती है।

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ब्रिटेन ने दिखा दिया कि लागू समझौता पहले दिन कैसा दिखता है। असली काम अब यह है कि दूसरा और तीसरा भी वक्त पर ज़मीन पर उतरे — शर्तों से समझौता किए बिना।

एक नज़र में

  • ब्रिटेन CETA: 15 जुलाई से लागू; पहले दिन 14 करोड़ डॉलर+ का बिना टैक्स निर्यात; 12% कपड़ा ड्यूटी खत्म
  • यूरोप (EU): जनवरी में सैद्धांतिक सहमति; कानूनी जांच एक-दो हफ्ते में पूरी; 2027 की शुरुआत में लागू
  • अमेरिका: ढांचा तैयार; “आखिरी 1%” बाकी; अंतरिम 10% शुल्क करीब 24 जुलाई को खत्म
  • भारत का रुख: जल्दबाज़ी नहीं, सही शर्तों पर सौदा — दूसरे एशियाई देशों से खराब दर मंज़ूर नहीं

अमेरिका वाले मोर्चे पर अटकाव छोटा पर असली है — भारत चाहता है कि उसके सामान पर टैक्स वियतनाम, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे देशों से ज़्यादा न हो, वहीं अमेरिका चाहता है कि कपड़ा, समुद्री माल और सस्ते सामान की सप्लाई चेन में मज़दूरी के नियमों की पक्की गारंटी मिले। वाणिज्य सचिव कह चुके हैं कि ढांचा तैयार है और बातचीत अच्छी चल रही है, पर तारीख तय करने से बचते हुए साफ है कि भारत घड़ी देखकर नहीं, सही शर्तों पर समझौता करेगा।

सीधी बात यह है कि बाज़ार मिल जाना सिर्फ न्योता है; कमाई तो ऑर्डर से आती है। ब्रिटेन (लागू), यूरोप (करीब) और अमेरिका (बाकी) — तीनों साथ हों तो भारतीय निर्यातकों को ऐसा रास्ता मिलेगा जो कम देशों के पास है। आगे का रास्ता छोटे-छोटे इंतज़ाम से होकर जाता है — सामान कहां का बना, इसका सर्टिफिकेट झट से मिले, नियम एक-दूसरे को मंज़ूर हों, और तिरुपुर, सूरत व विशाखापत्तनम के छोटे-मंझोले कारोबारियों तक भी कर्ज़ और मदद पहुंचे।

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