स्विट्जरलैंड का पांच साल का वीजा, 300 नौकरियां
स्विस राष्ट्रपति की राजकीय यात्रा में पांच दस्तावेजों पर दस्तखत हुए। पाठक के लिए सबसे बड़ी बात वीजा और युवा पेशेवरों का समझौता है। और $100 अरब के निवेश की घड़ी का पहला साल 7 अक्टूबर को पूरा हो रहा है।
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर। पुणे का कोई इंजीनियर या अहमदाबाद का कोई छात्र अब स्विट्जरलैंड का ऐसा वीजा पा सकेगा जो पांच साल चले। हर बार छह महीने तक रुकने की छूट होगी। छात्रों का परमिट एक-एक साल बढ़ता रहेगा। प्रधानमंत्री कार्यालय की 5 अक्टूबर 2026 की “लिस्ट ऑफ आउटकम्स” के मुताबिक यह प्रवासन और आवाजाही साझेदारी (माइग्रेशन एंड मोबिलिटी पार्टनरशिप) का हिस्सा है। उस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्विस राष्ट्रपति गी पारमेलां की मौजूदगी में दस्तखत हुए।
दूसरा समझौता युवा पेशेवरों का है। हर साल दोनों देशों के 300-300 युवा दूसरे देश में काम का अनुभव ले सकेंगे। यह संख्या 500 तक बढ़ाई जा सकती है। नागरिकता और निवास की जांच 30 या 90 दिन में पूरी होगी। स्विट्जरलैंड में यूरोप के बाहर के नागरिक को काम का परमिट मिलना बहुत मुश्किल है। इसलिए 300 की संख्या छोटी नहीं है।
100 अरब डॉलर का निवेश, 10 लाख नौकरियां
भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (ईएफटीए) का व्यापार समझौता टीईपीए अक्टूबर 2025 से लागू है। उसमें 15 साल में $100 अरब के निवेश और 10 लाख सीधी नौकरियों का वादा है। प्रधानमंत्री ने 5 अक्टूबर के साझा वक्तव्य में दोनों आंकड़े दोहराए। उन्होंने इसे यूरोप के किसी आर्थिक समूह से भारत का पहला मुक्त व्यापार समझौता बताया।
ब्लिट्ज का हिसाब :
बराबर बांटें तो हर साल $6.67 अरब का निवेश और 66,667 नौकरियां। पहला साल 7 अक्टूबर को पूरा होता है। उसी दिन नई दिल्ली में दूसरा भारत-ईएफटीए प्रॉस्पेरिटी समिट है। वहीं पता चलेगा कि पहले साल में कितना आया।
वाराणसी का रोपवे, जेवर का एयरपोर्ट
तीसरा दस्तावेज परिवहन तकनीक पर है। भारत का सड़क परिवहन मंत्रालय और स्विट्जरलैंड का आर्थिक मामलों का विभाग इलेक्ट्रिक गाड़ियों, रोपवे, सुरंग और सर्कुलर इकॉनमी पर साथ काम करेंगे। प्रधानमंत्री ने वाराणसी के रोपवे, नोएडा के जेवर हवाई अड्डे, पर्वतीय रेल और सुरंगों का नाम लिया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 5 अक्टूबर के राजकीय भोज में कहा कि स्विस कंपनियां भारत की सड़कों, रेल पुलों और सुरंगों में पहले से मौजूद हैं। राष्ट्रपति सचिवालय की उसी दिन की विज्ञप्ति में यह दर्ज है। उन्होंने स्वच्छ तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अगला क्षेत्र बताया।
विज्ञान पर दो कागज हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग का स्विस नेशनल साइंस फाउंडेशन से शोध का आशय-पत्र। और ज्यूरिख यूनिवर्सिटी ऑफ अप्लाइड साइंसेज से शुरुआती स्टार्टअप के प्रशिक्षण का समझौता। पहले इंडो-स्विस रिसर्च फ्लैगशिप की घोषणा भी हुई।
भारत को क्या मिला
तीन चीजें, जो 5 अक्टूबर से पहले नहीं थीं। पांच साल का वीजा। युवाओं के लिए 300 से 500 जगहें। और सुरंग-रोपवे की स्विस इंजीनियरिंग का सीधा रास्ता। प्रधानमंत्री ने रक्षा उत्पादन और परमाणु ऊर्जा में नई संभावनाओं की बात भी कही। पर ये दोनों आउटकम्स की सूची में नहीं हैं। यानी इन पर अभी कोई दस्तखत नहीं हुआ।
एक नजर में
•5 अक्टूबर 2026 को दस्तखत : 5 दस्तावेज, 1 घोषणा
•वीजा : 5 साल तक, हर बार 6 महीने;
•छात्र परमिट : 1 साल, बढ़ने वाला
•युवा पेशेवर : हर साल 300-300, 500 तक
टीईपीए का वादा : 15 साल में $100 अरब निवेश, 10 लाख नौकरियां।
तुलना
युवा पेशेवर, शुरुआती कोटा : 300 — 100%
युवा पेशेवर, बढ़ा कोटा : 500 — शुरुआती का 167%
बढ़ा हुआ कोटा शुरुआती से 66.7 फीसदी ज्यादा है।
हमारा हिसाब
हर साल निवेश : 100 ÷ 15 = $6.67 अरब। हर साल नौकरियां : 10,00,000 ÷ 15 = 66,667। ये दोनों सालाना आंकड़े समझौते या वक्तव्य में नहीं हैं; ब्लिट्ज का हिसाब हैं।
भारत को क्या मिला
स्विट्जरलैंड का पांच साल का वीजा, हर साल 300 से 500 युवाओं को काम का मौका, और वाराणसी-जेवर जैसी परियोजनाओं के लिए स्विस सुरंग-रोपवे इंजीनियरिंग।
ब्लिट्ज की सराहन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्विस राष्ट्रपति गी पारमेलां — वीजा और युवा पेशेवरों के समझौते समिट तक नहीं टाले।
आंकड़े प्रधानमंत्री कार्यालय की 5 अक्टूबर की आउटकम्स सूची और वक्तव्य, और राष्ट्रपति सचिवालय की 5 अक्टूबर की विज्ञप्ति से; pmindia.gov.in और pib.gov.in पर जांचे।
ब्लिट्ज़ की सलाह
विदेश मंत्रालय प्रवासन साझेदारी का पूरा पाठ वीजा की शर्तों के साथ जारी करे, ताकि आवेदक और कंपनियां समिट से पहले ही उस पर अमल कर सकें।
कोरापुट का 2,000वां इंजन, विशाखापत्तनम का पहला जहाज
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर ओडिशा के कोरापुट में एचएएल का कारखाना 1960 के दशक से हवाई जहाजों के इंजन बना रहा है। 6 अक्टूबर 2026 को वह अपना 2,000वां इंजन सौंप रहा है। उसी दिन आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में हिंदुस्तान शिपयार्ड से नौसेना का पहला फ्लीट सपोर्ट शिप पानी में उतर रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह दोनों जगह हैं। रक्षा मंत्रालय की 5 अक्टूबर 2026 की दो विज्ञप्तियों में यह दर्ज है।
कोरापुट में क्या बना
कोरापुट ने मिग-21 के आर-11 और आर-25 इंजन बनाए। सुखोई-30 का एएल-31एफपी इंजन बनाया। और एचएएल के अपने हेलीकॉप्टरों का शक्ति इंजन। मंत्रालय की विज्ञप्ति के मुताबिक अब वहां शक्ति इंजन की दूसरी लाइन लगेगी। इस पर 218 करोड़ रुपये लगेंगे। ध्रुव और प्रचंड हेलीकॉप्टरों की मांग बढ़ रही है, इसलिए। दूसरी लाइन का मतलब यह है कि भारत अपने हेलीकॉप्टर कितनी तेजी से बनाएगा, यह अब एक ही कारखाने की रफ्तार पर नहीं टिका। नई लाइन साल में कितने इंजन देगी, यह विज्ञप्ति में नहीं है।
विशाखापत्तनम में क्या उतरा
फ्लीट सपोर्ट शिप समुद्र में चलते युद्धपोतों को ईंधन, पानी, गोला-बारूद और सामान देता है। इससे नौसेना का बेड़ा बंदरगाह लौटे बिना लंबे समय तक समुद्र में रह सकता है। ऐसे पांच जहाज हिंदुस्तान शिपयार्ड बना रहा है। रक्षा मंत्रालय की 25 अगस्त 2023 की विज्ञप्ति के मुताबिक यह ठेका करीब 19,000 करोड़ रुपये का है। आठ साल में 168.8 लाख मानव-दिवस का काम। भारत में पहली बार बन रहे ऐसे जहाज।
पहला जहाज स्टील कटने के 18 महीने बाद पानी में उतर रहा है। उसी दिन पांचवें और आखिरी जहाज की कील रखी जा रही है। एक नया स्लिपवे-4 और 300 टन की गोलियथ क्रेन भी शुरू हो रही है। इससे शिपयार्ड 45,000 टन तक के जहाज बना सकेगा। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन मौजूद रहेंगे।
भारत को क्या मिला
इंजन और समुद्र में ईंधन देने वाले जहाज — ये दो चीजें भारत के लिए घर में बनाना सबसे मुश्किल रही हैं। कोरापुट बताता है कि लाइसेंस पर शुरू हुआ काम साठ साल में अपना उद्योग बन जाता है। विशाखापत्तनम बताता है कि सरकारी शिपयार्ड ठेके से तीन साल में 43,500 टन का पहला जहाज उतार सकता है।
एक नजर में
•एचएएल कोरापुट से अब तक इंजन : 2,000
•शक्ति इंजन की दूसरी लाइन : 218 करोड़ रुपये
•फ्लीट सपोर्ट शिप : 5, ठेका करीब 19,000 करोड़ रुपये, 25 अगस्त 2023
•पहला जहाज : 43,500 टन; स्टील कटने के 18 महीने बाद पानी में
•नया स्लिपवे और 300 टन क्रेन : 45,000 टन तक के जहाज
तुलना
ठेके से पहले जहाज के उतरने तक : करीब 37 महीने — 100%
स्टील कटने से उतरने तक : 18 महीने — 37 का 49%
ठेके के बाद का करीब आधा समय जहाज बनाने में गया, बाकी डिजाइन और यार्ड की तैयारी में।
हमारा हिसाब
एक जहाज की औसत कीमत : 19,000 ÷ 5 = 3,800 करोड़ रुपये। एक जहाज पर काम : 168.8 ÷ 5 = 33.76 लाख मानव-दिवस। दोनों ब्लिट्ज का हिसाब, मंत्रालय के 2023 के आंकड़ों पर।
भारत को क्या मिला
ओडिशा में हेलीकॉप्टर इंजन की दूसरी लाइन। एक सरकारी शिपयार्ड जो अब 45,000 टन के जहाज बना सकता है। और विशाखापत्तनम में 168.8 लाख मानव-दिवस का काम।
ब्लिट्ज की सराहना
एचएएल कोरापुट और हिंदुस्तान शिपयार्ड के कामगार, और रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार, जो दोनों कार्यक्रमों में हैं।
आंकड़े रक्षा मंत्रालय की 5 अक्टूबर 2026 और 25 अगस्त 2023 की विज्ञप्तियों से; pib.gov.in पर जांचे।
एशियाई खेल : 85 पदक, चौथा स्थान
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर। भारत ने आइची-नागोया एशियाई खेलों में 85 पदक जीते। 21 स्वर्ण, 27 रजत, 37 कांस्य। पदक तालिका में चौथा स्थान। यह गिनती 4 अक्टूबर 2026 के समापन के बाद डीडी न्यूज और आउटलुक की तालिकाओं की है। उज्बेकिस्तान के भी 21 स्वर्ण थे। भारत के 27 रजत उसके 25 से ज्यादा थे, इसी से चौथा स्थान तय हुआ। चीन 341 पदकों के साथ सबसे ऊपर रहा। मेजबान जापान के 269 और दक्षिण कोरिया के 150।
आखिरी दिन अकेले नौ पदक आए, जिनमें पांच स्वर्ण। क्रिकेट, हॉकी, तीरंदाजी और कुश्ती में। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 अक्टूबर 2026 के अपने संदेश में कहा कि खिलाड़ियों के प्रदर्शन ने देश को “अपार खुशी” दी है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने उसी दिन अदिति अशोक, प्रणवी शरत उर्स और दीक्षा डागर को महिला टीम गोल्फ के रजत पर अलग से बधाई दी। अंतिम पंघाल को कुश्ती के रजत पर। 3 अक्टूबर को पुरुष हॉकी टीम को स्वर्ण बचाने पर और अमन सहरावत को कुश्ती के स्वर्ण पर।
हांग्झोउ के मुकाबले
2023 में हुए हांग्झोउ के खेल भारत के सबसे अच्छे खेल बने हुए हैं। उस तालिका के दो छपे आंकड़ों में एक पदक का फर्क है। इसलिए ब्लिट्ज भारतीय ओलंपिक संघ की अपनी तालिका मिलने तक कोई संख्या नहीं छाप रहा। जो तय है, वह यह कि भारत लगातार दूसरे खेलों में चौथे स्थान पर रहा। किस खेल में पदक घटे और किसमें बढ़े, यह भारतीय खेल प्राधिकरण की अपनी सूची आने पर पता चलेगा।
एक नजर में
•भारत, आइची-नागोया 2026 : 21 स्वर्ण, 27 रजत, 37 कांस्य, कुल 85, चौथा स्थान
•आखिरी दिन : 9 पदक, 5 स्वर्ण
तुलना
•चीन, कुल पदक : 341 — सबसे ज्यादा, 100%
•जापान, कुल पदक : 269 — चीन का 79%
•भारत, कुल पदक : 85 — चीन का 25%
•भारत के पदक चीन से 75.1 फीसदी और जापान से 68.4 फीसदी कम हैं।
हमारा हिसाब
भारत के पदकों में स्वर्ण का हिस्सा : 21 ÷ 85 = 24.7 फीसदी। आखिरी दिन का हिस्सा : 9 ÷ 85 = 10.6 फीसदी। ब्लिट्ज का हिसाब, छपी तालिका पर।
भारत को क्या मिला
लगातार दूसरी बार शीर्ष चार में जगह, और पुरुष हॉकी का बचाया हुआ खिताब।
ब्लिट्ज की सराहना
सभी 85 पदक विजेता, और हरमनप्रीत सिंह की हॉकी टीम।
आंकड़े प्रधानमंत्री कार्यालय के 3 और 4 अक्टूबर 2026 के संदेशों और डीडी न्यूज व आउटलुक की 4 अक्टूबर 2026 की तालिकाओं से; pmindia.gov.in और ddnews.gov.in पर जांचे।
बिलासपुर एम्स का पहला दीक्षांत समारोह, राष्ट्रपति आएंगी
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर। हिमाचल प्रदेश के पहले एम्स से पहली बार डॉक्टर निकल रहे हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 6 अक्टूबर को बिलासपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के पहले दीक्षांत समारोह में शामिल होंगी। राष्ट्रपति सचिवालय की 5 अक्टूबर की विज्ञप्ति के मुताबिक उनका हिमाचल दौरा तीन दिन का है। 7 अक्टूबर को वे लाहौल-स्पीति में रोहतांग की अटल सुरंग देखेंगी। यह सुरंग सर्दियों में लाहौल घाटी को बाकी देश से जोड़े रखती है। पहला दीक्षांत वह घड़ी है जब कोई नया मेडिकल कॉलेज इमारत से डॉक्टर देने वाली संस्था बनता है। हिमाचल अपने गंभीर मरीज चंडीगढ़ भेजता रहा है। उसके लिए यही फायदा है।
योग-आयुर्वेद का 38 बच्चों पर अध्ययन
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर। छह साल की उम्र के बाद भी बिस्तर गीला करना भारत में बच्चों के डॉक्टर के पास आने की आम वजहों में है। घर में इस पर सबसे कम बात होती है। जामनगर के आयुर्वेद शिक्षण और अनुसंधान संस्थान (आईटीआरए) के अध्ययन में 6 से 14 साल के करीब 38 बच्चों को आठ हफ्ते देखा गया। यह अध्ययन संस्थान की पत्रिका “आयु” में छपा है। आयुष मंत्रालय ने 5 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति में इसकी जानकारी दी। एक समूह को मेध्य रसायन चूर्ण दिया गया — ब्राह्मी, शंखपुष्पी, मुलेठी और गिलोय का मिश्रण। दूसरे समूह को वही चूर्ण और सुबह-शाम चार आसन : •उत्कटासन, •अर्ध-शलभासन, •भुजंगासन और •शवासन।
मंत्रालय के बताए नतीजों के मुताबिक सिर्फ दवा वाले समूह में बिस्तर गीला करने की घटनाएं करीब 38 फीसदी घटीं। दवा और योग वाले समूह में करीब 70 फीसदी। याददाश्त में 31 फीसदी के मुकाबले 61 फीसदी सुधार। चिड़चिड़ापन करीब 66 फीसदी कम, और योग करने वाले बच्चों में अतिसक्रियता करीब 71 फीसदी कम।
लेखक हैं प्रोफेसर वैद्य वीरेंद्र कोरी, वैद्य सागर भिंडे और वैद्य अमेशा बावरवा।
अध्ययन क्या बताता है, क्या नहीं
ब्लिट्ज का हिसाब : दवा-और-योग का सुधार सिर्फ दवा के सुधार का 1.84 गुना है। इतने छोटे अध्ययन के लिए यह बड़ा असर है। और छोटा ही सही शब्द है। 38 बच्चे दो समूहों में बंटे, यानी करीब 19 प्रति समूह। विज्ञप्ति यह नहीं बताती कि बच्चे बेतरतीब बांटे गए या नहीं। आठ हफ्ते यह नहीं बताते कि फायदा टिका या नहीं। आईटीआरए की निदेशक प्रोफेसर तनुजा नेसरी की विज्ञप्ति में दी सलाह सही पढ़त है : कोई भी इलाज अपनाने से पहले योग्य चिकित्सक से मिलें। यह अध्ययन एक परिकल्पना देता है, जिस पर बड़ा परीक्षण होना चाहिए। आयुष मंत्रालय की शोध परिषदें इसी के लिए हैं।
भारत को क्या मिला आयुर्वेद में पहले से मौजूद इलाज में घर पर किया जा सकने वाला सस्ता जोड़। और एक छपा हुआ असर, जिस पर बड़ा परीक्षण डिजाइन हो सकता है।
पवन ऊर्जा 58.52 गीगावाट बनी, 41 बाकी
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर। भारत ने 2025-26 में 6.05 गीगावाट पवन क्षमता जोड़ी, जो किसी भी साल से ज्यादा है। अगस्त 2026 तक कुल 58.52 गीगावाट लग चुकी थी और 28 गीगावाट पर काम चल रहा था। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की 5 अक्टूबर की विज्ञप्ति में यह दर्ज है। विज्ञप्ति विंडरजी इंडिया 2026 की है। यह सम्मेलन और व्यापार मेला चेन्नई ट्रेड सेंटर में 7 से 9 अक्टूबर तक है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी 8 अक्टूबर को इसका उद्घाटन करेंगे। 20 से ज्यादा देशों के करीब 400 प्रदर्शक और 500 प्रतिनिधि आ रहे हैं। डेनमार्क, जर्मनी और स्पेन के अपने मंडप हैं।
लक्ष्य 2030 तक 100 गीगावाट है। अगस्त 2026 से फासला 41.48 गीगावाट का है। ब्लिट्ज का हिसाब : 6.05 की रिकॉर्ड रफ्तार पर यह फासला 6.9 साल में पटेगा। कैलेंडर चार साल से थोड़ा ज्यादा देता है। 28 गीगावाट की पाइपलाइन पूरी बन जाए तो आंकड़ा 86.52 गीगावाट होगा। तब भी 13.48 गीगावाट के ठेके बाकी रहेंगे। इसी हिसाब की वजह से विज्ञप्ति में देसी निर्माण, बड़े टरबाइन, एआई से रखरखाव और समुद्री पवन ऊर्जा को विषय बनाया गया है। पहले दो तेज बनाने के बारे में हैं, आखिरी इस बारे में कि बाकी गीगावाट खड़े कहां होंगे।
एक नजर में
•पवन क्षमता, अगस्त 2026 : 58.52 गीगावाट
•2025-26 में जुड़ी : 6.05 गीगावाट, रिकॉर्ड
काम चल रहा : 28 •गीगावाट; लक्ष्य 2030 : 100 गीगावाट
•विंडरजी इंडिया 2026 : चेन्नई, 7–9 अक्टूबर; करीब 400 प्रदर्शक, 20+ देश, 500 प्रतिनिधि
तुलना
•लक्ष्य 2030 : 100 गीगावाट — 100%
लगी हुई, अगस्त •2026 : 58.52 गीगावाट — लक्ष्य का 58.5%
लगी हुई और पाइपलाइन : 86.52 गीगावाट — लक्ष्य का 86.5%
•अब तक बनी क्षमता लक्ष्य से 41.5 फीसदी कम है; पाइपलाइन जोड़कर 13.5 फीसदी कम।
हमारा हिसाब
फासला : 100 − 58.52 = 41.48 गीगावाट। रिकॉर्ड रफ्तार पर साल : 41.48 ÷ 6.05 = 6.9। पाइपलाइन के बाद कमी : 100 − 86.52 = 13.48 गीगावाट। ब्लिट्ज का हिसाब, मंत्रालय के आंकड़ों पर।
भारत को क्या मिला
इतना बड़ा घरेलू बाजार कि 20 देशों के टरबाइन बनाने वाले चेन्नई आएं। और एक नापा हुआ फासला, जो बताता है कि लाइनें कितनी तेज चलनी हैं।
ब्लिट्ज की सराहना
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय और भारतीय पवन टरबाइन निर्माता संघ — लगी, जुड़ी और पाइपलाइन, तीनों संख्याएं एक साथ दीं।
आंकड़े नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की 5 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति से; pib.gov.in पर जांचे।
भारत-जापान कार्बन क्रेडिट की नियम-पुस्तिका आई
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर। मान लीजिए कोई भारतीय स्टील मिल जापानी तकनीक से अपनी बेकार गर्मी से बिजली बनाने लगे। उससे जो कार्बन बचेगा, वह जापान के जलवायु लक्ष्य में कैसे गिना जाएगा — अब इसका कदम-दर-कदम तरीका छप गया है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने भारत-जापान संयुक्त क्रेडिट तंत्र (जेसीएम) का ऑपरेशनल मैनुअल नई दिल्ली में जारी किया। मंत्रालय की 5 अक्टूबर को जारी विज्ञप्ति के मुताबिक जापान के राजदूत केइची ओनो और पर्यावरण सचिव तन्मय कुमार मौजूद थे।
मैनुअल पूरी परियोजना का रास्ता बताता है। प्रोजेक्ट आइडिया नोट, मंजूर तरीके, जांच और सत्यापन, क्रेडिट जारी करना और उसकी मंजूरी। और “करेस्पॉन्डिंग एडजस्टमेंट” — यानी वह हिसाब जो एक ही टन को दो बार गिनने से रोकता है। यही आखिरी बात इसे पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 का औजार बनाती है, स्वैच्छिक ऑफसेट नहीं।

तीन तारीखें, एक तंत्र
सहयोग ज्ञापन 7 अगस्त 2025 को हुआ। अमल के नियम 8 जून 2026 को बने। मैनुअल 30 सितंबर 2026 को आया। सीधी भाषा में : जापान भारत में कोई कम-कार्बन तकनीक लगाने में पैसा लगाता है। बचा हुआ उत्सर्जन नापा जाता है। क्रेडिट दोनों देशों में बंटते हैं। भारत को तकनीक और क्रेडिट का हिस्सा मिलता है, जापान को बाकी हिस्सा अपने लक्ष्य के लिए। बंटवारा कितना होगा, पहले कौन से क्षेत्र आएंगे, और कितनी परियोजनाएं कतार में हैं — ये तीन बातें विज्ञप्ति में नहीं हैं। पहले प्रोजेक्ट आइडिया नोट इनका जवाब देंगे।
भारत को क्या मिला
: जो तकनीक खरीदनी पड़ती, उसका खर्च आंशिक रूप से क्रेडिट का खरीदार उठाता है, और बचत का हिस्सा भारत अपने लक्ष्य में रखता है। फायदा तभी असली है जब पहले क्रेडिट जल्दी जारी हों।
तीन रसायन पार्क : प्रस्ताव मांगे गए
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 24 जुलाई 2026 को “भव्य रसायन” योजना मंजूर की थी। प्रधानमंत्री कार्यालय की उसी दिन की विज्ञप्ति के मुताबिक इसमें कम से कम 8 वर्ग किलोमीटर के तीन रसायन पार्क बनेंगे। हर पार्क पर केंद्र 1,000 करोड़ रुपये तक देगा और मेजबान राज्य कम से कम 500 करोड़। कुल खर्च 3,030 करोड़ रुपये, 2030-31 तक के पांच साल में। राज्य चुनौती के रास्ते से चुने जाएंगे। केंद्र का पैसा साझा ढांचे में लगेगा — एफ्लुएंट ट्रीटमेंट, पानी, पाइपलाइन, भाप और लॉजिस्टिक्स। कारखाने निजी पैसे से लगेंगे। रसायन और उर्वरक राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने 5 अक्टूबर को नई दिल्ली में इंडिया केम 2026 के लॉन्च पर कहा कि दिशा-निर्देश जारी हो गए हैं। उद्योग और राज्य अब मिलकर प्रस्ताव भेजें। प्रदर्शनी 22 से 24 अक्टूबर तक मुंबई में है। ब्लिट्ज का हिसाब : हर पार्क में कम से कम 1,500 करोड़ रुपये सरकारी पैसा, तीनों में 4,500 करोड़।














