दीपक द्विवेदी
कॉकपिट में चाकू के वार से घायल पड़े कैप्टन स्मित मच्छार के पास उस पल बहुत कम ताकत बची थी। उन्होंने उसी बची हुई ताकत से कॉकपिट का दरवाजा खोलने वाला बटन दबाया। भीतर मदद पहुंची और विमान में सवार 174 लोगों के सुरक्षित लौटने की राह खुल गई।
कभी-कभी संकट के बीच एक छोटा-सा निर्णय बहुत बड़ी दिशा तय कर देता है। फ्लाईदुबई की उड़ान एफजेड 1073 में वह निर्णय किसी लंबे आदेश या भाषण के रूप में नहीं आया। वह एक घायल कप्तान का अपने आसपास के लोगों के लिए किया गया आखिरी प्रयास था।
कैप्टन मच्छार विमान उड़ाने की स्थिति में नहीं थे। वे यात्रियों से बात भी नहीं कर सकते थे। फिर भी उन्होंने वह किया जो उस क्षण उनके हाथ में था। कॉकपिट का दरवाजा खोल दिया, ताकि बाकी लोग भीतर पहुंच सकें और संकट का सामना कर सकें। इजरायल के प्रधानमंत्री के प्रवक्ता ने बताया कि गंभीर रूप से घायल मच्छार ने कॉकपिट के फर्श पर पड़े-पड़े दरवाजे का रिलीज बटन दबाया। इससे यात्रियों और चालक दल के सदस्यों को भीतर पहुंचने का रास्ता मिला। घटना के कारण और सह-पायलट की भूमिका की जांच जारी है।
उड़ान में क्या हुआ
30 सितंबर को बोइंग 737 मैक्स 8 दुबई से तेल अवीव के लिए रवाना हुआ था। विमान में 174 लोग सवार थे, जिनमें अधिकतर इजरायली यात्री थे। इजरायली अधिकारियों के अनुसार, कॉकपिट के भीतर सह-पायलट ने कैप्टन मच्छार पर हमला किया। यात्रियों और केबिन क्रू ने हस्तक्षेप किया; सऊदी अधिकारियों ने बाद में को-पायलट को गिरफ्तार किया। घटना के पीछे का कारण अभी स्पष्ट नहीं है। फ्लाईदुबई ने कहा है कि औपचारिक जांच चल रही है और अटकलों से बचना चाहिए। विमान में यात्रा कर रहे फ्लाईदुबई के दो अन्य पायलटों ने कमान संभाली और विमान को सऊदी अरब के तबूक में सुरक्षित उतारा। इजरायल के विदेश मंत्रालय ने कहा कि विमान में सवार सभी 174 लोगों की जान बच गई। कॉकपिट में घायल व्यक्ति मुंबई के घाटकोपर का निवासी भारतीय पायलट था जिसकी जड़ें गुजरात से जुड़ी हैं।
उ स दिन उसकी कहानी राष्ट्रीयता और पेशे की सीमाओं से आगे बढ़कर एक बुनियादी मानवीय सवाल तक पहुंची, जब दूसरों की सुरक्षा आपके हाथ में हो, तो आप क्या करते हैं?
एक साल पहले कही गई बात
कैप्टन मच्छार की बहादुरी का आधार उनकी एक पुरानी सोच से जुड़ी है। एक बातचीत के दौरान 2025 में रिकॉर्ड किए गए एक पॉडकास्ट में उन्होंने यात्रियों की सुरक्षा को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता बताया था जो उनके पेशे के पीछे की सोच की झलक भी देती है। द नेशनल की 1 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा था कि उनकी सबसे बड़ी इच्छा यही रहती है कि हर यात्री विमान से सुरक्षित बाहर निकले। मुश्किल समय में यात्रियों से संवाद बनाए रखना भी उनके काम करने के तरीके का हिस्सा था। 30 सितंबर को वे बोल पाने की स्थिति में नहीं थे। फिर भी उन्होंने यात्रियों तक पहुंचने का एक रास्ता बनाया—दरवाजा खोलकर। यह उनकी पुरानी बात का नाटकीय पुनरावर्तन नहीं था; यह संकट के बीच जिम्मेदारी निभाने का एक ठोस और तत्काल निर्णय था।
आसमान में बना सहयोग
इस बचाव में किसी एक व्यक्ति का साहस महत्वपूर्ण था, लेकिन विमान को सुरक्षित लाने में कई लोगों ने भूमिका निभाई। एक भारतीय कप्तान गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद मदद का रास्ता खोल रहा था। यात्रियों और केबिन क्रू ने कॉकपिट तक पहुंचकर हस्तक्षेप किया। विमान में मौजूद अन्य पायलटों ने नियंत्रण संभाला। सऊदी अरब के तबूक में विमान उतरा, जहां घायल कैप्टन को अस्पताल में उपचार मिला।
इजरायल और सऊदी अरब के बीच राजनयिक संबंध नहीं हैं। फिर भी संकट में उतरे विमान के यात्रियों को तबूक में सहायता मिली और भारतीय कैप्टन का इलाज जारी है। भारतीय दूतावास के अनुसार, मच्छार की हालत स्थिर थी और रियाद स्थित दूतावास तथा जेद्दा का वाणिज्य दूतावास उनके उपचार पर नजर रख रहे थे।
भारत ने 2023 में अपनी जी20 अध्यक्षता के दौरान महाउपनिषद से लिया गया सूत्र दुनिया के सामने रखा था—वसुधैव कुटुम्बकम्, अर्थात पूरी धरती एक परिवार है। एफजेड 1073 की घटना इस विचार का दावा नहीं करती; लेकिन वह इसकी एक सहज मानवीय झलक जरूर दिखाती है। संकट में मदद पाने वाले और मदद करने वाले लोग अपनी भाषा, देश या पृष्ठभूमि से पहले मनुष्य थे।
कपड़े के कारोबार से कॉकपिट तक
पायलट बनना कैप्टन मच्छार का बचपन का सपना नहीं था। उन्होंने पहले टेक्सटाइल की पढ़ाई की और परिवार के कारोबार से जुड़ने की दिशा में बढ़े। 2025 के एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि विमानन में उनकी रुचि बाद में विकसित हुई। उन्होंने न्यूजीलैंड में उड़ान का प्रशिक्षण लिया।
वे 2011 में स्पाइसजेट से जुड़े और वहां एक दशक से अधिक समय तक काम किया। बाद में वे कमांडर और लाइन ट्रेनिंग कैप्टन बने जिसमें अनुभवी पायलट दूसरे पायलटों को प्रशिक्षित और परखते हैं। जून 2022 में वे फ्लाईदुबई में कैप्टन के रूप में शामिल हुए। उनके पास 13 वर्ष से अधिक का अनुभव और लगभग 9,750 घंटे की उड़ान का अनुभव था। वर्षों तक उन्होंने नए पायलटों को उड़ान की जिम्मेदारी निभाना सिखाया। 30 सितंबर को, जब उनका अपना शरीर गंभीर रूप से घायल था, उन्होंने उस जिम्मेदारी को एक अलग रूप में निभाया और मदद को भीतर आने देने का मार्ग प्रशस्त किया।
एक देश का सम्मान और देखभाल की जिम्मेदारी
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कैप्टन मच्छार के साहस और सूझबूझ की सराहना की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें “हीरो” बताते हुए कहा कि भारत को उन पर गर्व है। 1 अक्टूबर को नई दिल्ली में संघ लोक सेवा आयोग के शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री ने उनकी बहादुरी का उल्लेख किया और उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ तथा दीर्घायु के लिए प्रार्थना करने की बात कही। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी उनके असाधारण साहस और सूझबूझ की प्रशंसा की।
सम्मान के साथ देखभाल भी जरूरी है। भारतीय दूतावास और वाणिज्य दूतावास उनके उपचार और परिवार के संपर्क में हैं। संयुक्त अरब अमीरात में भारत के राजदूत दीपक मित्तल और दुबई के महावाणिज्य दूत ई. विष्णु वर्धन रेड्डी ने 1 अक्टूबर को उनके परिवार से मुलाकात की। गुजरात सरकार ने कैप्टन मच्छार को विशिष्ट गुजरात गरिमा पुरस्कार और 25 लाख रुपये देने की घोषणा की। देश का सम्मान केवल सार्वजनिक प्रशंसा में नहीं, बल्कि उस सहायता में भी दिखता है जो किसी व्यक्ति को लंबे स्वास्थ्य-लाभ और काम पर लौटने की कठिन प्रक्रिया में मिलती है।
भारत की पहचान का एक मानवीय पक्ष
विदेश में काम करने वाले भारतीयों की चर्चा अक्सर उनके कौशल, रोजगार और आर्थिक योगदान के संदर्भ में होती है। कैप्टन मच्छार की कहानी उस परिचित तस्वीर में एक और पहलू जोड़ती है; कठिन परिस्थिति में पेशेवर जिम्मेदारी, संयम और दूसरों के जीवन के प्रति प्रतिबद्धता।
यह घटना किसी देश की श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं, बल्कि अलग-अलग देशों और पृष्ठभूमियों के लोगों के सहयोग की कहानी है। कैप्टन मच्छार ने दरवाजा खोला; यात्रियों और चालक दल ने हस्तक्षेप किया; अन्य पायलटों ने विमान को सुरक्षित उतारा; और सऊदी अरब में घायल लोगों को चिकित्सा सहायता मिली। संकट का सामना सामूहिक रूप से हुआ।
घटना के पीछे का कारण और सह-पायलट की भूमिका जांच के अधीन है। कैप्टन मच्छार कब उड़ान पर लौट सकेंगे, यह उनके स्वास्थ्य और आवश्यक मेडिकल प्रमाणन पर निर्भर करेगा। इसलिए इस कहानी का अगला अध्याय प्रशंसा के साथ धैर्य और निरंतर सहायता का भी होना चाहिए।














