नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) का 81वां सत्र वैश्विक कूटनीति के इतिहास में भारत के एक नए और बेहद आक्रामक रूप का गवाह बना है। न्यूयॉर्क के मंच से भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने जो संदेश दिया, उसने वाशिंगटन से लेकर बीजिंग और मॉस्को से लेकर यूरोपीय राजधानियों तक हलचल पैदा कर दी है।
यह संबोधन महज एक भाषण नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (स्ट्रेटेजिक ऑटोनामी) का खुला घोषणापत्र था। अमेरिका द्वारा हाल ही में पारित किए गए बेहद सख्त ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ (एसआरआईए) की छाया के बीच भारत ने साफ कर दिया कि वह किसी की धौंस में आने वाला नहीं है।
एसआरआईए एक्ट और अमेरिका को दो टूक : ऊर्जा सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं एसआरआईए अमेरिका का वह नया दंडात्मक कानून है जिसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में हस्ताक्षरित किया है। एसआरआईए के तहत रूस से कच्चे तेल और गैस का बड़ा आयात करने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है जिसका सीधा असर भारत और चीन पर पड़ सकता है।
यूएनजीए के इतर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ बैठक हो या मुख्य मंच, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बिना किसी झिझक के भारत के आर्थिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोपरि रखा। भारत का संदेश स्पष्ट था कि 1.4 अरब आबादी की ऊर्जा जरूरतें हमारी पहली प्राथमिकता हैं और भारत डाइवर्सिफाइड सोर्सिंग (विविध स्रोतों) के जरिए तेल खरीदना जारी रखेगा। वाशिंगटन को यह कड़ा और सीधा संदेश है कि ‘मित्रता अपनी जगह है लेकिन भारत की संप्रभुता और आर्थिक नीतियां किसी अमेरिकी घरेलू कानून के अधीन नहीं हो सकतीं’।
रूस के साथ अटूट साझेदारी और यूरोप का दोगलापन : जयशंकर ने एक बार फिर मॉस्को के साथ भारत के विशेष संबंधों की वकालत की।
एनजीए के इतर रूसी विदेश मंत्री सर्जई लावरोव से उनकी मुलाकात और ब्रिक्स सहयोग पर चर्चा ने अमेरिका के इस कानून को सीधी चुनौती दी। यूक्रेन युद्ध के पांचवें वर्ष में प्रवेश करने के बीच भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस मंत्र को दोहराया कि यह अंतहीन युद्ध का नहीं, बल्कि युद्ध को समाप्त करने का समय है।
इसके साथ ही, यूरोप के संदर्भ में भारत ने पुरानी कूटनीतिक कड़वाहट को तार्किक रूप से रेखांकित किया। यूरोप की यह सोच कि ‘उसकी समस्याएं पूरी दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं उसकी नहीं’—आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है। जब यूरोप खुद गुपचुप तरीके से अपनी जरूरतें पूरी करता है तो वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साऊथ) पर प्रतिबंधों का बोझ लादना सरासर अन्याय है।
ग्लोबल साऊथ की बुलंद आवाज और 4एफ संकट
जयशंकर ने हर मंच पर भारत को वैश्विक साऊथ की प्रामाणिक आवाज के रूप में स्थापित किया। उन्होंने दुनिया का ध्यान ‘4एफ संकट’ः1- फूड (खाद्य), 2- फ्यूल (ईंधन), 3- फर्टिलाइजर (उर्वरक) और 4- फाइनेंस (वित्त) की ओर खींचा जिससे विकासशील और गरीब देश सबसे ज्यादा त्रस्त हैं। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए जा रहे प्रतिबंधों और युद्धों की कीमत उन देशों को चुकानी पड़ रही है जो इस संघर्ष से कोसों दूर हैं। भारत ने संदेश दिया कि वह केवल अपने स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि पूरे लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के उन देशों के हक के लिए लड़ रहा है जिनकी आवाज को दबा दिया जाता है।
चीन को कड़ा संदेश: बहुध्रुवीय एशिया के बिना बहुध्रुवीय विश्व असंभव
यूएनजीए के इस मंच से बीजिंग के लिए भी साफ संदेश था। भारत ने स्पष्ट किया कि वैश्विक व्यवस्था में संतुलन तभी आ सकता है जब एशिया में शक्ति का संतुलन हो। चीन की विस्तारवादी नीतियों और सीमा पर तनाव के बीच जयशंकर का रुख यह साफ करता है कि भारत एशिया में किसी भी एकतरफा आधिपत्य को स्वीकार नहीं करेगा।
वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व केवल वही कर सकता है जो सबके हितों की चिंता करे, न कि वह जो ऋण-जाल (डेट-ट्रैप) में छोटे देशों को फंसाए।
यूएनएससी में स्थायी सीट: लावरोव
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा कूटनीतिक मोड़ तब आया जब रूसी विदेश मंत्री सर्जई लावरोव ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में भारत की स्थायी सदस्यता का पुरजोर समर्थन किया। लावरोव ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यूएनएससी में अब एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका का प्रतिनिधित्व बढ़ना चाहिए और भारत इसका सबसे मजबूत हकदार है।
उन्होंने पश्चिमी देशों (जैसे जर्मनी और जापान) को और सीटें देने का कड़ा विरोध किया। जयशंकर ने इस समर्थन के साथ वैश्विक समुदाय को आईना दिखाया कि 1945 की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं पर आधारित यह संगठन आज अप्रासंगिक हो चुका है। यदि संयुक्त राष्ट्र को जीवित रहना है तो उसे भारत जैसी जनसांख्यिकीय और आर्थिक महाशक्ति को उसका वास्तविक हक देना ही होगा।
वैश्विक परिदृश्य में भारत की नई स्थिति और दुनिया को स्पष्ट संदेश
यूएनजीए 2026 में जयशंकर का यह रुख भारत को एक ‘सशक्त, निर्भीक और न्यायप्रिय’ वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करता है। भारत अब किसी एक गुट (पश्चिम या पूर्व) का हिस्सा नहीं है बल्कि वह खुद में एक स्वतंत्र ध्रुव है।
दुनिया को भारत का संदेश बिल्कुल साफ है:
1.आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस : आतंकवाद को जायज ठहराने की किसी भी कोशिश (जैसा कि पाकिस्तान ने प्रयास किया) का भारत कड़ा जवाब देगा।
2. रणनीतिक स्वायत्तता : प्रतिबंधों के डर से भारत अपनी विदेश नीति और ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा।
3.वैश्विक क्रम अनिवार्य : बहुपक्षवाद में सुधार टालेगा नहीं। भारत वैश्विक दक्षिण की लड़ाई अग्रिम मोर्चे पर रहकर लड़ता रहेगा। यही ‘न्यू इंडिया’ की कूटनीति है जो आंख झुकाकर नहीं बल्कि आंख में आंख डालकर बात करना जानती है।














