बड़ी ग्लोबल और भारतीय कंपनियां आगे आ रही हैं। फॉक्सकॉन, मदरसन और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स मोबाइल और आईटी हार्डवेयर एनक्लोजर में निवेश कर रही हैं। एटीएल इंडिया (जापान के टीडीके ग्रुप का हिस्सा) 29,000 करोड़ रुपये के कैपिटल एक्सपेंडिचर के साथ लिथियम-आयन बैटरी प्लांट बना रही है। विप्रो इंजीनियरिंग को 14,000 करोड़ रुपये की कॉपर लैमिनेट्स यूनिट के लिए मंजूरी मिल गई है।
भा रत का इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर एक रणनीतिक बदलाव से गुजर रहा है। यह सिर्फ फाइनल-असेंबली डेस्टिनेशन (अंतिम असेंबली का केंद्र) होने से आगे बढ़कर कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग के जरिए घरेलू स्तर पर ज्यादा वैल्यू जोड़ने की ओर बढ़ रहा है। जेफरीज की रिपोर्ट पर आधारित मीडिया के विश्लेषण के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में कुल इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन दोगुने से ज्यादा हो गया है; यह 2021 में 5.5 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2026 में 12.1 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जबकि एक्सपोर्ट में लगभग पांच गुना बढ़ोतरी हुई है।
2026 में, इलेक्ट्रॉनिक सामान वैल्यू के हिसाब से भारत की तीसरी सबसे बड़ी एक्सपोर्ट कैटेगरी बन गए, जिसमें स्मार्टफोन सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट होने वाला प्रोडक्ट बनकर उभरा।
अब, बैकवर्ड इंटीग्रेशन (सप्लाई चेन में पीछे की ओर एकीकरण) पर केंद्रित नई सरकारी योजनाओं के साथ, फोकस असेंबली से आगे बढ़कर डिवाइस के अंदर के पार्ट्स — जैसे कैमरे, डिस्प्ले, बैटरी और प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (पीसीबी को भारत में ही बनाने पर है।
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग
आज भारत में बिकने वाले लगभग 99 प्रतिशत मोबाइल फ़ोन घरेलू स्तर पर ही असेंबल किए जाते हैं, जिसका श्रेय 2021 में शुरू की गई मोबाइल पीएलआई (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) योजना की सफलता को जाता है। जेफरीज की रिपोर्ट में कहा गया है कि फॉक्सकॉन, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और सैमसंग जैसी कंपनियों ने लोकल प्रोडक्शन बढ़ाया है, और अब भारत का हिस्सा ग्लोबल आईफोन प्रोडक्शन में 25 प्रतिशत से ज्यादा हो गया है।
2025 में, भारत ने स्मार्टफ़ोन के टॉप एक्सपोर्टर के तौर पर अमेरिका को सप्लाई के मामले में चीन को भी पीछे छोड़ दिया, जो यह दिखाता है कि ग्लोबल कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को चीन से हटाकर दूसरी जगहों पर भी फैला रही हैं (डाइवर्सिफाई कर रही हैं)।
हालांकि, असेंबली की भारी मात्रा के बावजूद, घरेलू वैल्यू एडिशन 15 प्रतिशत से कम ही बना हुआ है। ज़्यादातर अहम कंपोनेंट — जैसे डिस्प्ले मॉड्यूल, कैमरा सेंसर और मल्टी-लेयर पीसीबी अभी भी इम्पोर्ट किए जाते हैं। हाल ही में हुई एक इंडस्ट्री एनालिसिस के अनुसार, भारत में बिकने वाले 99 प्रतिशत फोन यहीं असेंबल किए जाते हैं; विकास का अगला चरण कंपोनेंट्स का बड़े पैमाने पर स्थानीयकरण और घरेलू स्तर पर ज्यादा वैल्यू एडिशन करना है।
ईसीएमएस: बैकवर्ड इंटीग्रेशन को बढ़ावा
इस कमी को दूर करने के लिए, सरकार ने अप्रैल 2025 में 2,29,000 करोड़ रुपये के शुरुआती बजट के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स एंड मैटेरियल्स स्कीम (ईसीएमएस) शुरू की। निवेशकों की भारी दिलचस्पी के कारण, 2027 के बजट में इसके लिए फंड बढ़ाकर 4,00,000 करोड़ रुपये कर दिया गया यानी इसमें 75 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई। छह साल की इस स्कीम (2026-2032) का मकसद महंगे कंपोनेंट्स की स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना और आयात पर निर्भरता कम करना है।
अब तक ईसीएमएस के तहत 106 प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी दी जा चुकी है, जिनमें लगभग 6,95,000 करोड़ रुपये का कैपिटल एक्सपेंडिचर (पूंजीगत खर्च) शामिल है। यह शुरुआती लक्ष्य से लगभग दोगुना है। सरकार का अनुमान है कि इस स्कीम की अवधि के दौरान इन निवेशों से 53,40,000 करोड़ रुपये मूल्य के कंपोनेंट्स का उत्पादन होगा।
जेफरीज की रिपोर्ट के अनुसार, एनालिस्ट्स का अनुमान है कि ईसीएमएस: मोबाइल फोन में स्थानीय रूप से बने कंपोनेंट्स की हिस्सेदारी को मौजूदा 20 प्रतिशत से कम (बिल ऑफ मैटेरियल्स के आधार पर) से बढ़ाकर 2032 तक लगभग 50 प्रतिशत तक पहुंचा सकती है।
कंपोनेंट्स में कौन निवेश कर रहा है?
बड़ी ग्लोबल और भारतीय कंपनियां इसमें आगे आ रही हैं। फॉक्सकॉन, मदरसन और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स मोबाइल और आईटी हार्डवेयर एनक्लोजर में निवेश कर रही हैं। एटीएल इंडिया (जापान के टीडीके ग्रुप का हिस्सा) 29,000 करोड़ रुपये के कैपिटल एक्सपेंडिचर के साथ लिथियम-आयन बैटरी प्लांट बना रही है। विप्रो इंजीनियरिंग को 14,000 करोड़ रुपये की कॉपर लैमिनेट्स यूनिट के लिए मंजूरी मिल गई है।
घरेलू कंपनियों में डिक्सन टेक्नोलॉजीज शामिल है, जिसने डिस्प्ले मॉड्यूल यूनिट लगाने के लिए चीन की एचकेसी के साथ साझेदारी की है और कैमरा मॉड्यूल के लिए क्यूटेक इंडिया में हिस्सेदारी खरीदी है। सिर्मा एसजीएस, दक्षिण कोरिया की हिन्ह्युप के साथ मिलकर मल्टी-लेयर और एचडीआई पीसीबी मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में कदम रख रही है। इसके लिए उसे कुल 18,000 करोड़ रुपये की ईसीएमएस मंजूरी मिली है।
केन्स टेक्नोलॉजी को मल्टी-लेयर पीसीबी, कैमरा मॉड्यूल और कॉपर-क्लैड लैमिनेट्स (सीसीएल) के लिए मंजूरी मिल गई है।
निवेश का नजरिया
एनालिस्ट्स ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (ओईएमएस) के मुकाबले कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों को लेकर ज्यादा पॉजिटिव हैं, क्योंकि लोकलाइज़ेशन (स्थानीय स्तर पर उत्पादन) से ही ग्रोथ का अगला दौर शुरू होगा। जिन स्टॉक्स पर नजर रखी जा रही है, उनमें ‘केन्स टेक्नोलॉजी’ को बाय (खरीदने) की रेटिंग दी गई है, क्योंकि यह कंपनी कोर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज की ओर बढ़ रही है और इसकी नई ओएसएटी और पीसीबी क्षमताएं जल्द ही शुरू होने वाली हैं। ‘डिक्सन’ और ‘सिर्मा’ को होल्ड (बनाए रखने) की रेटिंग दी गई है, जिसकी वजह वैल्यूएशन से जुड़ी चिंताएं और काम को सही ढंग से पूरा करने से जुड़े जोखिम हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, हम कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि लोकलाइज़ेशन से ही इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में ग्रोथ का अगला दौर आएगा।
प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (पीसीबी) — खासकर हाई-डेंसिटी इंटरकनेक्ट (एचडीआई) और मल्टी-लेयर वाले एक अहम फोकस एरिया हैं। भारत के पीसीबी मार्केट का अनुमान 5,000-7,000 करोड़ रुपये है, लेकिन 85-90 प्रतिशत सप्लाई इम्पोर्ट (आयात) से आती है। छह लेयर तक के बोर्ड पर औसतन लगभग 30 प्रतिशत इम्पोर्ट ड्यूटी होने के कारण, स्थानीय स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग करने से लागत और सप्लाई चेन में काफी फायदे मिलते हैं।
एमपीएमएस 2.0: भारतीय मोबाइल ब्रांड्स को बढ़ावा
जुलाई में, सरकार ने मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (एमपीएमएस) 2.0 को मंज़ूरी दी, जिसके तहत पांच वर्षों में 6,25,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। जहां पहली पीएलआई स्कीम का फोकस असेंबली पर था, वहीं एमपीएमएस 2.0 वैल्यू एडिशन, सप्लाई चेन की गहराई और सबसे अहम बात — घरेलू आरएंडडी और डिजाइन पेटेंट के साथ भारतीय मोबाइल ब्रांड्स बनाने पर जोर देती है। यह स्कीम उन कंपनियों को बिक्री के आधार पर अतिरिक्त इंसेंटिव देती है जो घरेलू स्मार्टफोन ब्रांड्स विकसित और मार्केट करती हैं।
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब 2021 और 2026 के बीच भारत से आईफोन का एक्सपोर्ट तेज़ी से बढ़ा है, जो चीन और वियतनाम के साथ-साथ भारत को ग्लोबल एक्सपोर्ट हब के तौर पर इस्तेमाल करने की एपल की रणनीतिक बदलाव को दिखाता है।
ईसीएमएस और एमपीएमएस स्कीमें इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय के उस बड़े लक्ष्य के अनुरूप हैं, जिसके तहत 2030-31 तक इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन को 5,00,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाना है — जो 2025 में लगभग 1,40,000 करोड़ रुपये था। इसमें से लगभग 1,50,000 करोड़ रुपये कंपोनेंट्स से आने की उम्मीद है, जो आत्मनिर्भरता की दिशा में एक अहम कदम है। जैसा कि नीति आयोग ने जुलाई 2024 की एक रिपोर्ट में बताया है, स्मार्टफोन असेंबली में तो काफी हद तक स्थानीयकरण हुआ है, लेकिन हाई-टेक कंपोनेंट्स के लिए भारत अभी भी आयात पर निर्भर है। इसकी वजह है भारी निवेश (कैपेक्स) की ज़रूरत, लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रिया और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का सीमित होना। अब नई योजनाओं का मकसद खास इंसेंटिव, विदेशी पार्टनरशिप और भारत में कामकाज का दायरा बढ़ाकर इन रुकावटों को दूर करना है।













