नई दिल्ली। लक्ष्य के लिए सच्ची लगन हो तो कोई भी रुकावट या आर्थिक तंगी आपको मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती। इस मिसाल को बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के रहने वाले घनश्याम जायसवाल ने साबित कर दिखाया है।
घनश्याम के पिता शत्रुघ्न शाह बैरिया बस स्टैंड पर ठेले पर चाय और स्नैक्स की छोटी सी दुकान चलाते हैं, जबकि उनकी मां गृहिणी हैं। सात भाई-बहनों में तीसरे नंबर के घनश्याम ने सीमित संसाधनों और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद यूपीएससी सीएपीएफ (एसी) परीक्षा में ऑल इंडिया 81वीं रैंक हासिल कर असिस्टेंट कमांडेंट बनने का गौरव प्राप्त किया है।
आईआईटी का सपना टूटा, फिर सिविल सेवा की ओर बढ़ाया कदम
घनश्याम की शिक्षा और शुरुआती जीवन का सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। उन्होंने अपनी 10वीं तक की पढ़ाई मुजफ्फरपुर के नथुनी भगत विद्यालय से पूरी की। इसके बाद रामेश्वर सिंह कॉलेज से 12वीं (साइंस) और फिर पॉलिटिकल साइंस में ऑनर्स के साथ ग्रेजुएशन किया।
बचपन में उनका सपना आईआईटी में दाखिला लेकर इंजीनियर बनने का था। हालांकि जेईई परीक्षा में सफलता नहीं मिलने पर उन्होंने अपना रुख सिविल सेवा की ओर मोड़ा। कोविड-19 महामारी के दौरान परिवार को आर्थिक सहारा देने और अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए उन्होंने 12वीं तक के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया।
आसान नहीं था रास्ता
घनश्याम के लिए सफलता का यह रास्ता आसान नहीं था। वे 10 से अधिक अलग-अलग प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल हुए और 6 बार यूपीएससी की परीक्षाओं में भी उन्हें निराशा हाथ लगी।
इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। लगभग 5 वर्षों के निरंतर संघर्ष, धैर्य और कड़ी मेहनत के बल पर परीक्षा में झंडे गाड़ दिए।
कड़ी मेहनत और जिद से पाई सफलता
घनश्याम ने अपनी सीमित सुविधाओं को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। महंगी कोचिंग में जाने के बजाय उन्होंने खुद से पढ़ाई करने पर ध्यान केंद्रित किया। उनके पास जो भी संसाधन उपलब्ध थे, उन्हीं का सही इस्तेमाल किया। उनकी इस उपलब्धि से न केवल उनके माता-पिता का सिर गर्व से ऊंचा हुआ, बल्कि पूरे गांव और समाज में खुशी की लहर दौड़ गई।













