ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। इस साल की अर्जुन सूची में सत्रह नाम हैं। इनमें तीन खिलाड़ी पैरा या मूक-बधिर वर्ग के हैं — और साल का इकलौता संस्थागत पुरस्कार भी एक पैरालंपिक केंद्र को मिला।
युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय ने 18 अगस्त को राष्ट्रीय खेल पुरस्कार 2025 की घोषणा की। चयन समिति की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अरुण कुमार मिश्रा ने की। सत्रह खिलाड़ियों को अर्जुन पुरस्कार मिला, फ़ुटबॉल के आई अरुमैनयगम को अर्जुन (आजीवन) पुरस्कार मिला, तीन कोचों को द्रोणाचार्य (नियमित) और दो को द्रोणाचार्य (आजीवन) मिला। राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार सेना के आर्मी पैरालंपिक नोड, पुणे को मिला।
सूची पढ़िए तो कुछ बातें ख़ुद उभरकर आती हैं। एथलेटिक्स से तीन नाम — तेजस्विन शंकर, मुहम्मद अजमल वी और प्रियंका गोस्वामी। बैडमिंटन से दो — त्रीसा जॉली और पुलेला गायत्री गोपीचंद। शतरंज से भी दो — विदित संतोष गुजराती और दिव्या जितेंद्र देशमुख। हॉकी से लालरेम्सियामी और राजकुमार पाल, कबड्डी से सुरजीत और पूजा।
दो में से एक: दिव्या देशमुख, जिन्हें विदित संतोष गुजराती के साथ अर्जुन पुरस्कार के लिए चुना गया। एक ही साल में शतरंज को सत्रह नामों की सूची में दो जगह मिलीं।
मूक-बधिर निशानेबाज़ी में धनुष श्रीकांत, पैरा-निशानेबाज़ी में रुद्रांश खंडेलवाल, पैरा एथलेटिक्स में एकता भ्यान। सत्रह में तीन — यानी हर पाँच में लगभग एक।
एक नज़र में
• घोषणा: 18 अगस्त 2026, युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय
• चयन समिति अध्यक्ष: न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अरुण कुमार मिश्रा
• अर्जुन पुरस्कार: 17 खिलाड़ी
• अर्जुन (आजीवन): आई अरुमैनयगम, फ़ुटबॉल
• द्रोणाचार्य (नियमित): परवीर सिंह, छोटे लाल यादव, नेहा नंदकुमार चव्हाण
• द्रोणाचार्य (आजीवन): धर्मेंद्र सिंह यादव, वीरेंद्र कुमार
• राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार: आर्मी पैरालंपिक नोड, पुणे
सबसे बड़ा बदलाव पैरा खेलों की हिस्सेदारी में है। धनुष श्रीकांत मूक-बधिर निशानेबाज़ी में, रुद्रांश खंडेलवाल पैरा-निशानेबाज़ी में और एकता भ्यान पैरा एथलेटिक्स में खेलते हैं। सत्रह में से तीन, यानी लगभग हर पाँच में एक। इसमें आर्मी पैरालंपिक नोड, पुणे को मिला इकलौता संस्थागत पुरस्कार जोड़ दीजिए, तो साफ़ है कि पैरा खेल अब भारतीय खेल व्यवस्था के किनारे नहीं, बीच में आ रहा है। इस साल निशानेबाज़ी से जुड़े तीन में से दो अर्जुन पुरस्कार पैरा या मूक-बधिर वर्ग से हैं।
दूसरी बात शतरंज की है। एक ही साल में दो अर्जुन पुरस्कार बताते हैं कि यह खेल अब इक्का-दुक्का प्रतिभाओं का नहीं, गहराई वाला खेल बन गया है — और इसे चलाने का ख़र्च किसी निशानेबाज़ी रेंज या वेलोड्रोम के मुक़ाबले बहुत कम है। छोटे शहरों के बच्चों के लिए यह रास्ता सबसे खुला हुआ है। एक और बदलाव प्रक्रिया में हुआ है: अब खिलाड़ी, कोच और संस्थाएँ ख़ुद ऑनलाइन पोर्टल पर आवेदन कर सकती हैं, किसी की सिफ़ारिश का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। आगे का सही क़दम यह होगा कि समिति यह भी बताए कि किस आधार पर अंक दिए गए। जब आवेदन खुले हों, तो कसौटी भी खुली होनी चाहिए।













