ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।पचास साल तक भारत के स्कूलों की सबसे बड़ी समस्याएँ थीं — बच्चे स्कूल आएँ, शिक्षक पूरे हों, शौचालय और पानी हो। ये लगभग हल हो चुकी हैं। जो एक कमी बची है वह सबसे नई है, और अगले दस साल के हर सुधार का रास्ता उसी से होकर जाता है।
शिक्षा मंत्रालय की यूडाइस+ 2025-26 रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में 24.72 करोड़ छात्र और 1.03 करोड़ शिक्षक हैं, और स्कूलों की संख्या क़रीब 14.67 लाख है। छात्र-शिक्षक अनुपात 24:1 है, जो एनईपी 2020 के 30:1 के मानक से बेहतर है। बिजली 95 फ़ीसदी स्कूलों में है, पीने का साफ़ पानी 99.5 फ़ीसदी में, लड़कियों के शौचालय 98.5 फ़ीसदी में और लड़कों के 97.2 फ़ीसदी में। स्कूल छोड़ने की दर तैयारी स्तर पर 1.8 फ़ीसदी और माध्यमिक स्तर पर 7.0 फ़ीसदी रह गई है। मध्य स्तर पर नामांकन 89.6 फ़ीसदी है और माध्यमिक स्तर पर 71.7 फ़ीसदी। इंटरनेट 67.4 फ़ीसदी स्कूलों तक पहुँचा है।
पैमाना समझिए: 24.72 करोड़ छात्र और 1.03 करोड़ शिक्षक। पानी, बिजली और शौचालय जैसी जिन चीज़ों में चालीस साल लगे, वे लगभग पूरी हो चुकी हैं। इंटरनेट का काम दो-तिहाई हुआ है।
14.67 लाख स्कूलों का 32.6 फ़ीसदी यानी क़रीब 4.78 लाख स्कूल — जहाँ आज इंटरनेट नहीं है। अगले दस साल का हर डिजिटल सुधार इन्हीं तक सबसे आख़िर में पहुँचेगा।
एक नज़र में
• छात्र: 24.72 करोड़ · शिक्षक: 1.03 करोड़ · स्कूल: क़रीब 14.67 लाख
• छात्र-शिक्षक अनुपात: 24:1, एनईपी मानक 30:1 से बेहतर
• इंटरनेट: 67.4 फ़ीसदी स्कूलों में — क़रीब 4.78 लाख स्कूल बाक़ी
• बिजली: 95% · पीने का पानी: 99.5% · लड़कियों के शौचालय: 98.5%
• ड्रॉपआउट: तैयारी स्तर 1.8%, माध्यमिक 7.0% — 2022-23 से कम
• नामांकन: मध्य स्तर 89.6%, माध्यमिक 71.7%
• महिला शिक्षक: कुल शिक्षकों का 54.9 फ़ीसदी
अब दो आँकड़े साथ रखकर देखिए। मध्य स्तर पर नामांकन 89.6 फ़ीसदी है और माध्यमिक स्तर पर 71.7 फ़ीसदी। यानी क़रीब अठारह फ़ीसदी बच्चे आठवीं में मौजूद हैं और दसवीं तक पहुँचते-पहुँचते नहीं रहते। भारत के भविष्य का सबसे बड़ा हिसाब यहीं तय होता है, क्योंकि पक्की नौकरी, आईटीआई-कौशल प्रमाणपत्र और आगे की पढ़ाई — तीनों का दरवाज़ा दसवीं से खुलता है। और यही वह स्तर है जहाँ पढ़ाई सबसे ज़्यादा उन चीज़ों पर टिकी होती है जो इंटरनेट लाता है: प्रयोगशाला का वीडियो प्रयोग, दूर बैठा विषय-विशेषज्ञ शिक्षक ऐसे स्कूल के लिए जहाँ भौतिकी का शिक्षक ही नहीं, बोर्ड परीक्षा का प्रश्न-बैंक, और वह छात्रवृत्ति जिसका आवेदन सिर्फ़ ऑनलाइन होता है। 2026 में बिना इंटरनेट वाला स्कूल पिछड़ा हुआ भर नहीं है — वह अपनी शिक्षक-कमी के सबसे सस्ते इलाज से भी कटा हुआ है।
अच्छी बात यह है कि बची हुई समस्याओं में यह सबसे आसान है, और भारत इससे कठिन काम दो बार कर चुका है। स्कूलों में बिजली पुरानी शिकायत थी, आज 95 फ़ीसदी तक पहुँच चुकी है; पीने का पानी 99.5 फ़ीसदी तक। ये अपील से नहीं हुए — लक्ष्य तय हुआ, पैसा दिया गया, और इसी यूडाइस+ आँकड़े में हर स्कूल की गिनती हुई। इंटरनेट इन दोनों से आसान है, क्योंकि इसमें न खुदाई चाहिए न टंकी — बैंडविड्थ, एक उपकरण, बिजली का बैकअप और स्कूल में एक ज़िम्मेदार व्यक्ति। सबसे कारगर तरीक़ा यह होगा कि पहले उन्हीं ज़िलों के माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्कूल जोड़े जाएँ जहाँ आठवीं से दसवीं के बीच बच्चों का छूटना सबसे ज़्यादा है, न कि पूरे देश में बराबर-बराबर फैलाया जाए। यूडाइस+ को पहले से पता है कि वे स्कूल कौन-से हैं। हर साल यह आँकड़ा जुटाने का असली फ़ायदा यही है — शुरुआत कहाँ से करनी है, यह अंदाज़े से तय नहीं करना पड़ता।













