ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।7 अगस्त को देश ने 12वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया। भाषणों में विदेशी बाज़ार की चर्चा रही। पर निर्यात का आंकड़ा बुनकरों की संख्या के सामने रखिए, तो इस उद्योग की असली तस्वीर कुछ और निकलती है।
2025-26 में हथकरघा निर्यात क़रीब ₹1,330.96 करोड़ रहा। ख़रीदने वालों में यूएई, अमेरिका, फ़्रांस, ब्रिटेन और स्पेन आगे रहे। दूसरी तरफ़ चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना के मुताबिक़ देश में 31.45 लाख हथकरघा परिवार और 35.22 लाख बुनकर व सहयोगी कामगार हैं। दोनों को भाग दीजिए तो निर्यात प्रति कामगार साल भर में चार हज़ार रुपये से भी कम बैठता है। इतने में कोई घर नहीं चलता — और चलाना मक़सद भी नहीं है। बात सिर्फ़ इतनी है कि हथकरघा मूलतः देश का बाज़ार है, विदेश का नहीं। बनारस की साड़ी, बिहार का गमछा, कश्मीर की कानी शॉल — इनका ख़रीदार भारतीय है और पैसा रुपये में आता है।
बाज़ार घर में है: ₹1,331 करोड़ का निर्यात 35.22 लाख कामगारों में बंटे तो साल भर में चार हज़ार रुपये से कम। रोज़ी देश से आती है, विदेश से बोनस।
बुनकर के लिए सबसे बड़ी योजना कोई निर्यात मेला नहीं। वह क़ानून है जो ग्यारह कपड़ों को पावरलूम पर बनाने से रोकता है।
एक नज़र में
• मौक़ा: 12वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस, 7 अगस्त, राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र
• यही तारीख़ क्यों: 1905 के स्वदेशी आंदोलन की याद में
• पुरस्कार: 2025 के लिए 22 — तीन संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और 19 राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार
• कामगार: 35.22 लाख बुनकर व सहयोगी, 31.45 लाख परिवार (चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना)
• निर्यात: 2025-26 में क़रीब ₹1,330.96 करोड़; मुख्य ख़रीदार यूएई, अमेरिका, फ़्रांस, ब्रिटेन, स्पेन
• क़ानूनी सुरक्षा: हथकरघा (वस्तु उत्पादन आरक्षण) अधिनियम, 1985 — 11 वस्तुएं सिर्फ़ हथकरघा के लिए आरक्षित
• और: बुनाई परंपराओं पर चार यादगार डाक टिकट जारी
इसीलिए इस क्षेत्र की सबसे कम चर्चा वाली चीज़ ही सबसे ताक़तवर है — 1985 का हथकरघा आरक्षण क़ानून। यह क़ानून ग्यारह तरह के कपड़ों को सिर्फ़ हथकरघा पर बनाने के लिए आरक्षित रखता है, यानी घरेलू बाज़ार का एक तय हिस्सा पावरलूम और मिलों की पहुंच से बाहर रहता है। मेले और प्रदर्शनी दिखते हैं, यह सूची नहीं दिखती। पर नादिया या भागलपुर के बुनकर के लिए यही सूची उसके करघे और उस मशीन के बीच खड़ी दीवार है जो कभी नहीं रुकती। इस सूची का पालन कितना सख़्ती से होता है — असली लड़ाई वहीं है, कंटेनर तक पहुंचने से बहुत पहले।
पाठक के लिए इसका मतलब आसान है। हथकरघा उन गिने-चुने उद्योगों में है जहां ख़रीदार ही असल में नियामक है। दुकान पर हैंडलूम मार्क मांग लेना, या यह पूछ लेना कि साड़ी सचमुच हाथ की है या पावरलूम की नक़ल — इतना भर करने से पैसा उसी घर तक पहुंचता है जिसने उसे बुना। आगे का रास्ता भी तय है: ऐसा प्रमाणपत्र जो ग्राहक फ़ोन पर जांच सके, युवा डिज़ाइनरों को मास्टर बुनकरों के साथ जोड़ना, और ऑनलाइन बिक्री जो करघे और ख़रीदार के बीच की कड़ियां घटा दे। इस हफ़्ते के पुरस्कार हुनर का सम्मान हैं। असली इनाम वह बाज़ार होगा जहां हुनर को हर बार पूरा दाम मिले।














