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मिलिट्री इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में बड़ी कामयाबी

एईएसए रडार के लिए पूरी तरह घरेलू मैन्युफैक्चरिंग बेस तैयार

by ब्लिट्ज़ इंडिया
July 13, 2026
in रक्षा
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एयूडी यूजी एडमिशन 2026

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। भारत ने हाल ही में मिलिट्री इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की है। उसने गैलियम नाइट्राइड (जीएएन) एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (एईएसए) रडार के लिए पूरी तरह से घरेलू मैन्युफैक्चरिंग बेस तैयार कर लिया है।

यह खास उपलब्धि देश को तकनीकी रूप से एडवांस्ड देशों के चुनिंदा ग्रुप में शामिल करती है।

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यह डेवलपमेंट सिर्फ़ एक आम हार्डवेयर अपडेट नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी छलांग है।

यह दिखाता है कि भारत विदेशी सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी पर निर्भरता छोड़कर, अगली पीढ़ी के मिलिट्री रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और हाई-फ़्रीक्वेंसी चिप्स को डिज़ाइन और बनाने में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गया है। इस टेक्नोलॉजी में महारत हासिल करने की कोशिश जियोपॉलिटिकल जरूरत की वजह से शुरू हुई थी।

फ्रांस ने इनकार कर दिया था

2016 में राफेल फाइटर जेट की बातचीत के दौरान, फ्रांस ने कथित तौर पर अपने एडवांस्ड रडार में इस्तेमाल होने वाली जीएएन चिप्स की अहम टेक्नोलॉजी शेयर करने से मना कर दिया था। इसके लिए उसने वासेनार अरेंजमेंट जैसे सख्त एक्सपोर्ट कंट्रोल का हवाला दिया था।

इस मनाही की वजह से भारत उस समय टॉप-लेवल की रडार टेक्नोलॉजी हासिल नहीं कर पाया था।

स्वदेशी डेवलपमेंट अभियान
लगातार विदेशी निर्भरता पर टिके रहने के बजाय, भारत ने ज़ोरदार तरीके से स्वदेशी डेवलपमेंट अभियान शुरू किया।

डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइज़ेशन ने अपनी सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी और गैलियम आर्सेनाइड इनेबलिंग टेक्नोलॉजी सेंटर के जरिए इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया। इस प्रोजेक्ट का पूरा ध्यान जटिल जीएएन आर्किटेक्चर में महारत हासिल करने पर था।

तीस से ज़्यादा तरह की हाई-फ़्रीक्वेंसी चिप्स डेवलप

सफलतापूर्वक तीस से ज़्यादा तरह की हाई-फ़्रीक्वेंसी चिप्स डिज़ाइन की गईं और अत्याधुनिक मिलिट्री इस्तेमाल के लिए ज़रूरी मैन्युफैक्चरिंग क्वालिटी हासिल की। यह बड़ी कामयाबी भारत के अहम डिफेंस प्रोजेक्ट्स को इंटरनेशनल सप्लाई चेन के झटकों और टेक्नोलॉजी ब्लॉकेड से बचाती है।

गैलियम नाइट्राइड पुराने गैलियम आर्सेनाइड सिस्टम से बेहतर

तकनीकी रूप से, गैलियम नाइट्राइड पुराने गैलियम आर्सेनाइड सिस्टम की तुलना में बहुत बेहतर है।

ओपन-सोर्स डेटा से पता चलता है कि जीएएन सेमीकंडक्टर, जीएएएस की तुलना में पांच गुना तक ज़्यादा पावर डेंसिटी देते हैं और बहुत ज़्यादा तापमान पर भी सुरक्षित रूप से काम कर सकते हैं। ये कम गर्मी पैदा करते हुए भी ज़्यादा पावर बनाते हैं, जिससे डिटेक्शन रेंज बढ़ जाती है, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर की क्षमताएं बेहतर होती हैं, टारगेट की साफ़ इमेजिंग मिलती है और बहुत ज़्यादा जैमिंग वाले कॉम्बैट ज़ोन में बचने की संभावना भी बढ़ जाती है।

इन फ़ायदों को देखते हुए, भारत ने पुरानी टेक्नोलॉजी को छोड़कर सीधे अपने आने वाले रडार नेटवर्क में जीएएन को शामिल करने का फ़ैसला किया है।

विरुपाक्ष एईएसए रडार

इसका एक बेहतरीन उदाहरण विरुपाक्ष एईएसए रडार है, जिसे डीआरडीओ के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड रडार डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट ने 63,000 करोड़ रुपये के ‘सुपर सुखोई अपग्रेड प्रोग्राम’ के लिए डिज़ाइन किया है।

विरुपाक्ष सिस्टम में लगभग 2,400 जीएएन-बेस्ड ट्रांसमिट और रिसीव मॉड्यूल होंगे और इसने हाल ही में फ़रवरी 2026 में अपना ‘फ़र्स्ट लाइट’ पावर-ऑन माइलस्टोन हासिल किया है।

यह नया रडार पारंपरिक टारगेट के लिए 400 किलोमीटर से ज़्यादा की ट्रैकिंग रेंज देगा और कहा जाता है कि यह 200 किलोमीटर दूर से ही कम-सिग्नेचर वाले स्टील्थ एयरक्राफ़्ट का पता लगा सकता है।

रूसी पीईएसए रडार से कहीं बेहतर

यह भारत के एसयू-30एमकेआई जेट पर अभी लगे पुराने रूसी पीईएसए रडार से कहीं बेहतर है, और वजन में भी काफ़ी हल्का है। इस कदम से भारत आधुनिक फ़ाइटर रडार क्षमताओं के मामले में रूस से काफ़ी आगे निकल गया है।

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