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आखिर कैसे रुकेगी हेल्थ सेक्टर की लूट ?

सरकार को इस ओर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत

by ब्लिट्ज़ इंडिया
October 27, 2025
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। देश में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोग हमेशा से ही शक के दायरे में रहे हैं। डाक्टर हों या जांच कराने या करने वाले; दवा निर्माता हों या उन्हें बेचने वाले, इन सभी पर सदा ही यह संदेह बना रहता है कि ये सही जांच एवं इलाज दे रहे हैं कि नहीं।
ऐसा इसलिए भी है कि अक्सर ऐसी तमाम रिपोर्टें अखबारों और विभिन्न मीडिया में आती रहती हैं जो चिकित्सा क्षेत्रों से जुड़े लोगों को प्रायः कटघरे में ला देती हैं। ऐसी घटनाओं में सर्वाधिक मामले मामूली बीमारी में भी हजारों रुपये की जांच कराए जाने अथवा बिना आवश्यकता के भी ऑपरेशन कराने के लिए भर्ती कराए जाने के होते हैं। अतः अब इस बात की जरूरत है कि सरकार इस ओर गंभीरता से ध्यान दे ताकि देश के हर व्यक्ति को सही और उतना ही इलाज मिले जितनी कि उसे जरूरत हो।
हाल ही में आई एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 44% मानव शल्यक्रियाएं (सर्जरी) फर्ज़ी, धोखाधड़ीपूर्ण या अनावश्यक रूप से कराई जाती हैं। इसका अर्थ यह है कि देश में किए जाने वाले लगभग आधे ऑपरेशन केवल मरीजों या सरकार को लूटने के उद्देश्य से किए गए जाते हैं। यह जानकारी एक चैनल की हालिया शोध रिपोर्ट से मिली है।
रिपोर्ट के अनुसार, 55% हृदय शल्यक्रियाएं, 48% हिस्टेरेक्टॉमी (गर्भाशय निकालना), 47% कैंसर सर्जरी, 48% घुटना प्रत्यारोपण, 45% सी-सेक्शन, कंधा प्रत्यारोपण, रीढ़ की हड्डी के ऑपरेशन आदि भारत में फर्ज़ी या अनावश्यक ही होते हैं।
बीएमजे ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र के कई प्रतिष्ठित अस्पतालों में किए गए सर्वेक्षण से पता चला कि बड़े अस्पतालों में वरिष्ठ डॉक्टरों को एक-एक करोड़ रुपये मासिक वेतन दिया जाता है। कारण यह है कि जो डॉक्टर अधिक जांच, उपचार, भर्ती और ऑपरेशन करवाते हैं—चाहे आवश्यकता हो या न हो—उन्हें अधिक वेतन से पुरस्कृत किया जाता है।
कई मामलों के अध्ययन के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक रिपोर्ट छापी कि मृत मरीजों को ज़िंदा दिखाकर इलाज किया गया और पैसे ऐंठे गए। यह अत्यंत शर्मनाक कृत्य कई जगह उजागर हुआ है।
डिस्सेंटिंग डायग्नोसिस के डा. अरुण गदरे और डा. अभय शुक्ला के स्रोतों से मिली रिपोर्ट के अनुसार एक मामले में, एक प्रतिष्ठित अस्पताल ने 14 वर्षीय मृतक लड़के को जीवित बताकर एक महीने तक वेंटिलेटर पर रखा और “इलाज” किया। बाद में उसे मृत घोषित किया गया। शिकायत पर अस्पताल दोषी पाया गया और परिवार को 5 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया गया लेकिन परिवार ने एक माह तक जो मानसिक पीड़ा झेली उसका क्या मुआवजा हो सकता है?
ऐसे भी आरोप हैं कि कई बार अस्पताल मृतक मरीजों पर भी तुरंत ऑपरेशन का नाटक करते हैं, परिवार से तुरंत पैसे मांगते हैं और बाद में कहते हैं कि “ऑपरेशन के दौरान मृत्यु हो गई।” इस तरह भारी रकम वसूली जाती है।
बीमा (मेडिक्लेम) घोटाला
भी कम भयावह नहीं
भारत में लगभग 68% लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा है लेकिन आवश्यकता पड़ने पर दावे अस्वीकार कर दिए जाते हैं या आंशिक भुगतान किया जाता है और शेष खर्च परिवार पर छोड़ दिया जाता है।
करीब 3,000 प्रतिष्ठित अस्पताल बीमा कंपनियों द्वारा फर्ज़ी दावों के कारण ब्लैकलिस्ट किए जा चुके हैं। कोविड-19 काल में कई बड़े अस्पतालों ने फर्ज़ी कोविड केस बनाकर बीमा कंपनियों को ठगा।
मानव अंग तस्करी भी बड़े स्तर पर हो रही है
2019 में इंडियन एक्सप्रेस ने एक दर्दनाक घटना उजागर की थी। कानपुर की संगीता कश्यप को दिल्ली में नौकरी का झांसा देकर दिल्ली के एक बड़े निजी अस्पताल ले जाया गया। स्वास्थ्य जांच के बहाने उसे भर्ती कर लिया गया। संयोग से उसने डॉक्टरों को “डोनर”शब्द बोलते सुना और वहां से भाग निकली। शिकायत पर एक अंतरराष्ट्रीय अंग तस्करी रैकेट का भंडाफोड़ हुआ जिसमें डॉक्टर, मेडिकल स्टाफ, पुलिस आदि शामिल पाए गए।
‘अस्पताल रेफरल’ घोटाला भी व्यापक
कुछ डॉक्टर मरीज को गंभीर बीमारी बताकर बड़े अस्पताल भेजते हैं। अनेक बड़े निजी अस्पतालों में रेफरल प्रोग्राम चलते हैं। मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल ने खुलेआम 40 मरीज भेजने पर ₹1 लाख, 50 मरीज पर ₹1.5 लाख और 75 मरीज पर ₹2.5 लाख देने की पेशकश की। मरीज की हालत चाहे जैसी हो, डॉक्टर को रेफरल फीस सीधे बैंक खाते में मिलती है।
‘डायग्नोसिस घोटाला’- अरबों का धंधा है
बेंगलुरु में आयकर विभाग की छापेमारी में प्रतिष्ठित पैथोलॉजी लैब से 100 करोड़ रुपये नकद और 3.5 किलो सोना मिला जो डॉक्टरों को रिश्वत देने के लिए रखा गया था। डॉक्टर अनावश्यक जांच लिखते हैं और 40-50% तक कमीशन लेते हैं। अधिकतर जांचें सिर्फ़ कागज पर दिखती हैं। यही कारण है कि भारत में 2 लाख से अधिक लैब हैं जबकि केवल 1,000 ही प्रमाणित हैं।
फार्मा कंपनियों के घोटाले
20-25 बड़ी दवा कंपनियां हर साल डाक्टरों पर 1,000 करोड़ रुपये खर्च करती हैं। कोविड काल में डोलो टैबलेट बेचने वाली कंपनी का घोटाला सामने आया। डाक्टरों को अपनी दवा लिखवाने के लिए कंपनियां नकद, विदेश यात्राएं और 5-7 दिन के फाइव स्टार होटल में ठहराव देती हैं। उदाहरण के लिए मुंबई की एक बड़ी दवा कंपनी हर डॉक्टर को 3 लाख रुपये नकद या ऑस्ट्रेलिया/अमेरिका यात्रा देती है।
अस्पताल–फार्मा कंपनी गठजोड़
कई कंपनियां सर्जरी उपकरण और दवाएं अस्पतालों को बेहद सस्ते में देती हैं लेकिन मरीज से अत्यधिक दाम वसूले जाते हैं। इंडिया टुडे की जांच में पाया गया कि एमक्योर कंपनी की कैंसर दवा टेमिक्योर अस्पताल को ₹ 1,950 में मिलती है लेकिन मरीज से ₹ 18,645 वसूले जाते हैं। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) 2016 में सरकारी समिति की रिपोर्ट ने साफ लिखा है कि एमसीआई मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति देने में तो सक्रिय है लेकिन डाक्टरों और अस्पतालों को नियंत्रित करने में पूरी तरह विफल है।

एमसीआई के नियम, जिनका अक्सर उल्लंघन होता है
1. डाक्टर को ब्रांडेड दवा नहीं बल्कि जेनरिक दवा लिखनी चाहिए।
2. डाक्टर को उपचार से पहले अपनी पूरी फीस बतानी चाहिए
3. जांच/इलाज से पहले मरीज की सहमति अनिवार्य है।
4. प्रत्येक मरीज का रिकॉर्ड कम से कम 3 वर्ष सुरक्षित रखना ज़रूरी है।
5. अनैतिक या अयोग्य डाक्टर को उजागर करना डाक्टर का कर्तव्य है।
6. आयुष्मान एवं सीजीएचएस जैसी सरकारी योजनाओं में भी भारी घोटाला है।
7. ईसीएचएस कार्ड धारक पूर्व सैनिकों को मामूली बीमारी में भी भर्ती कर लिया जाता है और नकली इलाज दिखाकर लाखों रुपये का बिल बनाया जाता है। इसमें अस्पताल और भ्रष्ट अधिकारी, दोनों शामिल रहते हैं।

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