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सुप्रीम कोर्ट ने मंदिरों में वीआईपी ट्रीटमेंट को बताया मनमाना

- पॉलिसी मैटर बताकर दखल से किया इनकार

by ब्लिट्ज़ इंडिया
February 9, 2025
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Supreme Court calls VIP treatment in temples arbitrary
ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंदिरों में ‘वीआईपी दर्शन’ सुविधा को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि यह एक नीतिगत मामला है, जिस पर केंद्र सरकार को विचार करना होगा। बेंच ने यह भी कहा कि वीआईपी के लिए ऐसा विशेष व्यवहार मनमाना है। यह याचिका मंदिरों की तरफ से वसूले जाने वाले वीआईपी दर्शन शुल्क को समाप्त करने की मांग कर रही थी।

बेंच इस मुद्दे से सहमत
सीजेआई ने कहा कि बेंच इस मुद्दे से सहमत है, लेकिन अनुच्छेद 32 के तहत निर्देश जारी नहीं कर सकती। उन्होंने कहा, ‘हालांकि हमारी राय है कि मंदिरों में प्रवेश के संबंध में कोई विशेष व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन हमें नहीं लगता कि यह अनुच्छेद 32 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने का उपयुक्त मामला है।’ यह आदेश में दर्ज किया गया लेकिन मामला सरकार के विचार के लिए छोड़ दिया गया।

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मामला कानून-व्यवस्था का
सीजेआई खन्ना ने कहा कि यह मामला कानून-व्यवस्था का प्रतीत होता है और याचिका इस पहलू पर होनी चाहिए थी। बेंच ने कहा, ‘हम स्पष्ट करते हैं कि याचिका खारिज होने से संबंधित अधिकारियों को जरूरत के हिसाब से कार्रवाई करने से नहीं रोका जाएगा।’

मानक संचालन प्रक्रिया’ बनानी होगी
याचिकाकर्ता के वकील ने जोर देकर कहा कि राज्यों को प्रसिद्ध मंदिरों में दर्शन के लिए किसी प्रकार की ‘मानक संचालन प्रक्रिया’ (एसओपी) बनानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को विशेष व्यवहार देना मनमाना और समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, ‘आज 12 ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ इस प्रैक्टिस को फॉलो करते हैं। ये मनमाना और भेदभाव वाला है। यहां तक कि गृह मंत्रालय ने भी आंध्र प्रदेश से इसकी समीक्षा करने को कहा है। चूंकि, भारत में 60 प्रतिशत पर्यटन धार्मिक है, इसलिए ये भगदड़ की प्रमुख वजह भी है।’

व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन
सुप्रीम कोर्ट में ये याचिका विजय किशोर गोस्वामी ने डाली थी। उन्होंने मंदिरों में अतिरिक्त शुल्क लेकर ‘वीआईपी दर्शन’ के चलन को आर्टिकल 14 के तहत समानता के अधिकार और आर्टिकल 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया। उन्होंने दलील दी कि जो लोग इस तरह का शुल्क अदा करने में असमर्थ हैं, ये उनके खिलाफ भेदभाव है।

याचिका में जोर देकर कहा गया था कि कई मंदिर 400 से 500 रुपये में लोगों के लिए विशेष दर्शन की व्यवस्था करते हैं। इससे आम श्रद्धालु और खासकर महिलाएं, स्पेशली एबल्ड लोग और सीनियर सिटिजंस को दर्शन में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

भेदभाव का मुद्दा
यह मामला देश भर के मंदिरों में आम लोगों और वीआईपी के बीच भेदभाव के मुद्दे को उठाता है। वीआईपी दर्शन की सुविधा से आम लोगों को लंबी कतारों में इंतजार करना पड़ता है, जबकि वीआईपी आसानी से दर्शन कर लेते हैं।

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