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17 साल बाद दिल्ली में बैडमिंटन का वर्ल्ड कप

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 8, 2026
in the blitz, खेल
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।बैडमिंटन विश्व चैंपियनशिप 17 अगस्त से दिल्ली के इंदिरा गांधी एरिना में शुरू हो रही है। 2009 के बाद पहली बार यह ख़िताब भारत में तय होगा। और इन सत्रह बरसों में इस खेल में जो बदला है, वही असली ख़बर है।

2009 में जब हैदराबाद में यह प्रतियोगिता हुई थी, किसी भारतीय का क्वार्टर फ़ाइनल तक पहुंचना ही सुर्ख़ी बन जाता था। आज देश अपनी ही चैंपियनशिप में सीड खिलाड़ियों की उम्मीद लेकर उतरता है। यही फ़र्क़ सबसे बड़ा है — भागीदारी से उम्मीद तक का सफ़र। यह 30वां संस्करण 23 अगस्त तक चलेगा और इसमें 55 से ज़्यादा देशों के क़रीब 800 खिलाड़ी उतरने की उम्मीद है। तारीख़ भी अहम है: एशियाई खेल 19 सितंबर से जापान के आइची-नागोया में शुरू हो रहे हैं, यानी दिल्ली सिर्फ़ ख़िताब नहीं, तैयारी की परीक्षा भी है।

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हवा का खेल: हॉल का तापमान और नमी तय करती है कि शटल कितनी दूर जाएगी। इसीलिए अपने ही हॉल में दो हफ़्ते की प्रैक्टिस दर्शकों के शोर से ज़्यादा काम आती है।

घरेलू मैदान का फ़ायदा शोर नहीं है। फ़ायदा यह जानना है कि इस ख़ास हॉल में शटल आख़िर कितनी दूर तक जाती है।

एक नज़र में

• प्रतियोगिता: बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप 2026, 30वां संस्करण
• तारीख़: 17 से 23 अगस्त 2026
• जगह: इंदिरा गांधी एरिना, नई दिल्ली
• पिछली बार भारत में: 2009 — यानी सत्रह साल का अंतराल
• खिलाड़ी: 55 से ज़्यादा देशों के क़रीब 800 खिलाड़ी
• अगला पड़ाव: एशियाई खेल, आइची-नागोया (जापान), 19 सितंबर से 4 अक्टूबर

बैडमिंटन में घरेलू मैदान का फ़ायदा सिर्फ़ भावना नहीं, तकनीक है। शटल पंखों वाली होती है और तेज़ी से धीमी पड़ती है। कितनी तेज़ी से, यह हॉल के तापमान, नमी और हवा के बहाव पर निर्भर करता है। खिलाड़ी हॉल को ‘तेज़’ या ‘धीमा’ इसी वजह से कहते हैं, और इस फ़र्क़ को समझने में पहला गेम निकल सकता है। जो टीम दो हफ़्ते उसी हॉल में अभ्यास कर चुकी है, उसने यह हिसाब ड्रॉ निकलने से पहले ही लगा लिया होता है। यह वह बढ़त है जो किसी प्रीव्यू में नहीं दिखती और तीसरे गेम में काम आती है।

पर सबसे बड़ा फ़ायदा मैदान के बाहर होगा। भारत में खेल का अनुभव बताता है कि घर पर होने वाली विश्व प्रतियोगिता ख़िताब से ज़्यादा नई पौध देती है। सत्रह साल पहले हैदराबाद में जो बच्चा टीवी पर देख रहा था, उसे करियर की कल्पना करनी पड़ती थी। इस महीने इंदिरा गांधी एरिना की सीढ़ियों पर बैठी बच्ची वही करियर अपनी आंखों के सामने, अपने शहर में, उन्हीं लोगों को करते देखेगी जो उसी ज़िला स्तर के सिस्टम से निकले हैं। जो संघ इन दो हफ़्तों को खुली ट्रेनिंग, स्कूल कार्यक्रमों और कोचिंग शिविरों से जोड़ देंगे, उन्हें पदक तालिका से कहीं ज़्यादा मिलेगा। कोर्ट और कोच अब देश के पास हैं। जो अब तक नहीं था, वह यह दृश्य था — पास में, अपनी भाषा में, अपने शहर में।

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