• Latest
  • Trending
medicine

‘एंटीबायोटिक दवाओं का चालीस फीसद मरीजों पर असर बंद’

November 8, 2024
यशोभूमि, नई दिल्ली में 10वें इंडिया मोबाइल कांग्रेस के उद्घाटन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, 8 अक्टूबर 2026। श्रेय : पीएमओ (pmindia.gov.in)

किसान के फोन पर किस्त, हर जिले में 5जी

October 8, 2026
यूपीआई और डीपीआई ने बदली भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था

कर्ज महंगा, पर अर्थव्यवस्था 7.1% की रफ्तार पर

October 7, 2026
भारत विकास: वीजा, रक्षा, खेल और ऊर्जा की बड़ी खबरें

भारत विकास: वीजा, रक्षा, खेल और ऊर्जा की बड़ी खबरें

October 6, 2026
भारतीय पायलट के हौसले की इंतहा...!

भारतीय पायलट के हौसले की इंतहा…!

October 5, 2026
jai-shankar

न्यूयॉर्क में दिखी नए भारत की ‘दबंग कूटनीति’

October 5, 2026
संसद का मॉनसून सत्र 2026: हंगामे में बर्बाद हुआ समय और जनता के धन का नुकसान

लोकतंत्र में विपक्ष कितना रचनात्मक

October 5, 2026
अर्थव्यवस्था के नए इंजन: उभरते 100 शहरों में 55 भारतीय

अर्थव्यवस्था के नए इंजन: उभरते 100 शहरों में 55 भारतीय

October 5, 2026
परमार्थ के पथ पर अशोक सिंघल युवा उनके आदर्शों से लें प्रेरणा

परमार्थ के पथ पर अशोक सिंघल युवा उनके आदर्शों से लें प्रेरणा

October 5, 2026
स्लीमनाबाद टनल

विंध्य की धरती को मिलेगा मां नर्मदा का आशीर्वाद, जल सुरंग की खुदाई पूरी

October 5, 2026
ev-scooter

23 रुपए में दिनभर के लिए इलेक्टि्रक स्कूटर

October 5, 2026
सोना 4,550 डॉलर के पार, चांदी भी 67 डॉलर के ऊपर

सोना गिरवी रखकर लोन लेने में यूपी वाले सबसे आगे

October 5, 2026
metro

मुंबई मेट्रो का महाविस्तार: 6 नए रूट पर 374 किमी में 130 स्टेशन

October 5, 2026
Thursday, October 8, 2026
Retail
संपर्क
डाउनलोड
  • देश
  • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय
    • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्री
  • चुनाव विशेष
  • स्टेट-नेशनल
  • महिला-खेल
  • डाउनलोड
  • अंग्रेजी
  • संपर्क
  • ई-पेपर
No Result
View All Result
Welcome To Blitz India Media
No Result
View All Result

‘एंटीबायोटिक दवाओं का चालीस फीसद मरीजों पर असर बंद’

आईसीएमआर की रिपोर्ट के दावे ने बढ़ाई चिंता

by ब्लिट्ज़ इंडिया
November 8, 2024
in the blitz
0
medicine
ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। ‘लैंसेट’ पत्रिका के एक अध्ययन में देश में संक्रमण से 2019 में 29.9 लाख लोगों की मौत हुई थी जिसमें 60 फीसद संख्या बैक्टीरिया संक्रमण और 44.6 फीसद मौत एंटीबायोटिक दवाओं के मरीज पर बेअसर रहने के कारण हुई थी।

बीसवीं सदी में सर एलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने पहली एंटीबायोटिक के रूप में पेनिसिलिन की खोज की थी। यह दुनिया के लिए वरदान बन कर सामने आई थी। इस खोज ने मौत के मुंह में जा रहे लाखों मरीजों को जीवनदान दिया। इसके बाद पूरी दुनिया में एंटीबायोटिक का ऐसा चलन चला कि चिकित्सक ही नहीं, आम लोग भी हर मर्ज का इलाज एंटीबायोटिक में खोजने लगे। मगर अधिक उपयोग से अब इसके विपरीत परिणाम आने लगे हैं।

YOU MAY ALSO LIKE

किसान के फोन पर किस्त, हर जिले में 5जी

कर्ज महंगा, पर अर्थव्यवस्था 7.1% की रफ्तार पर

अनियंत्रित उपयोग पर रोक की चेतावनी
बेवजह एंटीबायोटिक के सेवन के कारण शरीर में मौजूद जीवाणु अब प्रतिरोधी जीवाणु (बैक्टीरिया) का रूप लेकर इतने अधिक शक्तिशाली बन गए हैं कि इन बैक्टीरिया पर संक्रमण रोकने की सारी दवाएं बेअसर साबित होने लगी हैं। दुनिया भर में दस लाख संक्रमित मरीजों की मौत सिर्फ इसलिए हो रही है कि उपलब्ध एंटीबायोटिक बेअसर साबित हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रपट कहती है कि एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होने के कारण 2050 तक विश्व में मौत की दर एक करोड़ प्रतिवर्ष तक पहुंच जाएगी।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कई देशों को चेतावनी जारी की है कि बगैर स्वास्थ्य परीक्षण के मरीजों को एंटीबायोटिक दवा देने पर पूरी तरह रोक लगाई जानी चहिए। 2030 तक सिर्फ आपातकालीन स्थिति को छोड़ कर, बगैर स्वास्थ्य परीक्षण के, एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग पर विश्व के सभी देशों को रोक लगानी होगी। अन्यथा हालात बेकाबू हो सकते हैं। इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) की रपट चिंता बढ़ाने वाली है। मौजूदा स्थिति में चालीस फीसद मरीजों पर एंटीबायोटिक दवाओं ने असर दिखाना बंद कर दिया है। निमोनिया, टाइफाइड और मूत्र संक्रमण में अधिकांश एंटीबायोटिक दवाएं अब निष्कि्रय साबित हो रही हैं।

आसान उपलब्धता से खतरा
देश में बगैर डाक्टरी पर्चे के आसानी से एंटीबायोटिक दवाओं की उपलब्धता, बची हुई दवा का मरीज द्वारा भविष्य में स्वयं या परिवार के लिए उपयोग में लाना और एंटीबायोटिक को उचित रूप से नष्ट करने के बजाय कचरे में फेंकना गंभीर मसला है। दूसरी ओर अपनी जीनोमिक संरचना में परिवर्तन कर बैक्टीरिया मौजूदा दवाओं के प्रति अपनी प्रतिरोधक क्षमता लगातार विकसित कर रहे हैं।

झोलाछाप डॉक्टरों की बढ़ती संख्या और गैर पेशेवर इलाज
देश में झोलाछाप डाक्टरों की भरमार, रोग के सामान्य लक्षण भर देख कर गैर पेशेवर द्वारा बीमारी का इलाज, दवाओं का खर्च बढ़ाने के लिए अनावश्यक एंटीबायोटिक दवाओं को मरीज के पर्चे में जोड़ा जाना, मर्ज को लाइलाज बना कर मरीज को मौत के मुंह में धकलने से कम नहीं है। बैक्टीरिया, वायरस और अन्य रोगाणुओं का धरती पर इतिहास रहा है। मानव जीवन की उत्पत्ति इसके बहुत बाद की है।

बैक्टीरिया और मानव जीवन का ऐतिहासिक संबंध
पृथ्वी के हर कालखंड में सभी प्रतिकूल परिस्थितियों में बैक्टीरिया जीवित रहे हैं। क्योंकि इनके अंदर प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर प्रकृति परिवर्तन में जीवित रहने की दक्षता है। मानव शरीर में लाखों की संख्या में सुसुप्त अवस्था में बैक्टीरिया मौजूद हैं, जिसमें कुछ अच्छे तो कुछ बुरे हैं। बीमारी की हालत में बुरे बैक्टीरिया मानव शरीर को नुकसान पहुंचाने के लिए सक्रिय होते हैं। बैक्टीरिया एकल कोशिका के रूप में शरीर के अंदर-बाहर स्वतंत्र रूप से जीवित रह सकता है। इसके विपरीत वायरस परजीवी है, जो स्वतंत्र रूप में जीवित नहीं रह सकता है। बीमारी की स्थिति में दोनों लक्षण एक जैसे ही हैं। इसलिए मात्र बाह्य परीक्षण के आधार पर यह कह पाना असंभव है कि संक्रमण का कारण क्या है।

स्वास्थ्य परीक्षण के बिना उपयोग खतरनाक
संक्रमण में बगैर खून और अन्य जांच के बिना एंटीबायोटिक का उपयोग मरीज के शरीर के साथ खिलवाड़ है। शल्य चिकित्सा, कैंसर और अंग प्रत्यारोपण में बैक्टीरिया नियंत्रण के लिए एंटीबायोटिक दवाओं से इलाज में आवश्यकता होती है, लेकिन शरीर में मौजूद बैक्टीरिया अगर पहले से ही प्रतिरोधक क्षमता हासिल कर शक्तिशाली हो चुके हों, तो इन परिस्थितियों में मौजूदा एंटीबायोटिक से संक्रमण पर काबू कर पाना बहुत मुश्किल होता है। जबकि संक्रमण की रफ्तार कई गुना अधिक हुआ करती है। इन परिस्थितियों में इलाज लंबा और खर्चीला तो होता ही है, यह लाइलाज भी बन सकता है।
‘लैंसेट’ पत्रिका के एक अध्ययन में देश में संक्रमण से 2019 में 29.9 लाख लोगों की मौत हुई थी। जिसमें 60 फीसद संख्या बैक्टीरिया संक्रमण और 44.6 फीसद मौत एंटीबायोटिक दवाओं का मरीज पर बेअसर रहने के कारण हुई थी। अस्पतालों में नवजात शिशुओं को धड़ल्ले से एंटीबायोटिक देने का चलन है। इसके पीछे वजह यह है कि एंटीबायोटिक दवा नवजात को देने से पहले उसके रक्त की जांच आवश्यक है, लेकिन देश के अधिकांश शासकीय और निजी अस्पतालों में ‘माइक्रोबायोलाजिस्ट’ के पद खाली हैं। लिहाजा, जांच नहीं होती।

रक्त जांच के बिना यह कह पाना मुश्किल है कि संक्रमित नवजात पर कौन-सी एंटीबायोटिक कारगर है। जांच रपट के अभाव में चिकित्सक नवजात के शरीर में एंटीबायोटिक का उपयोग तब तक करते हैं, जब तक शिशु बेहतर महसूस नहीं करता है। देश में नवजात शिशुओं की मौत की संख्या प्रति हजार पर छब्बीस है।

बढ़ता स्वास्थ्य जोखिम
वर्तमान में बच्चों को भी एंटीबायोटिक दवाएं दी जाने लगी हैं। इससे उनके शरीर में मौजूद बैक्टीरिया अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा कर इतने शक्तिशाली हो सकते हैं कि आगामी पांच-दस वर्ष बाद एंटीबायोटिक बेअसर साबित हो सकती है। यह भविष्य में घटित होने वाले खतरे की आहट है। वर्ष 2017 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने एंटीबायोटिक के इस्तेमाल को लेकर एक दिशा-निर्देश जारी किया था, जिसमें चिकित्सक के पर्चे के बगैर एंटीबायोटिक के विक्रय पर सख्ती के साथ रोक, रक्त की जांच रपट के बगैर चिकित्सकों द्वारा स्वत: ज्ञान के आधार पर एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर रोक और आम जनता को भी एंटीबायोटिक के उपयोग में अधिक जागरूकता के लिए अधिकाधिक कार्यक्रम चलाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को दी थी, लेकिन केंद्र सरकार के इस आदेश पर केरल के अलावा दक्षिण के कुछ राज्यों ने ही गंभीरता दिखाई। जबकि उत्तर भारत के राज्यों में जहां चिकित्सक के पर्चे के बगैर दवाएं उपलब्ध हैं, तो झोलाछाप चिकित्सक ग्रामीण आबादी के इलाज में एंटी वायरस के साथ मनमाफिक एंटीबायोटिक का उपयोग बराबर की मात्रा में करते हैं। इन राज्यों में एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध उपयोग से बचने के लिए आम लोगों में जागरूकता नहीं लाई गई है।

एंटीबायोटिक दवाओं की पहचान करना आम आदमी के लिए मुश्किल है। इसलिए होना यह चाहिए कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय बाजार में बिकने वाली दवाओं में एंटी बैक्टीरिया और एंटी वायरल दवाओं पर उनकी पहचान जारी करे। इसमें रंग के अंतर या पहचान चिह्नित कर उपभोक्ताओं को जागरूक किया जा सकता है कि एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल में उन्हें अतिरिक्त सुरक्षा बरतनी है। चिकित्सक द्वारा लिखी एंटीबायोटिक की पूरी अवधि की दवा का उपयोग होना चाहिए।

अपने मन से कम या अतिरिक्त मात्रा में उपयोग नहीं होना चाहिए। बगैर चिकित्सक की सलाह के एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग मरीज को नहीं करना चहिए। बची हुई दवा कहीं भी नहीं फेंकनी चाहिए। यह जागरूकता स्कूली और महाविद्यालयी छात्रों में पैदा की जानी चाहिए, ताकि वे अपने परिवारों में जागरूकता ला सकें।

ShareTweetSend

POPULAR NEWS

  • India shows way out to UN military observer group

    संरा के सैन्य पर्यवेक्षक समूह को भारत ने दिखाया बाहर का रास्ता

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • प्रोपर्टी पर जिसका 12 साल से कब्जा, वही होगा मालिक

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • 12 साल से है जमीन पर कब्जा तो वही होगा असली मालिक

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • गंगाजल खराब नहीं होता, लेकिन क्यों ?

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
  • पृथ्वी का आखिरी देश जहां सूरज केवल 40 मिनट के लिए ही डूबता है

    0 shares
    Share 0 Tweet 0
Welcome To Blitz India Media

© 2023 Blitz India Media -BlitzIndia Building A New Nation

Navigate Site

  • About
  • Our Team
  • Contact

Follow Us

No Result
View All Result
  • देश
  • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय
    • उत्तर-प्रदेश
  • राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्री
  • चुनाव विशेष
  • स्टेट-नेशनल
  • महिला-खेल
  • डाउनलोड
  • अंग्रेजी
  • संपर्क
  • ई-पेपर

© 2023 Blitz India Media -BlitzIndia Building A New Nation