ब्लिट्ज ब्यूरो
भारत और न्यूज़ीलैंड ने ऑकलैंड में एक ऐतिहासिक दिन का समापन रिश्ते को “रणनीतिक साझेदारी” तक उन्नत कर और “2030 का रोडमैप” अपनाकर किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे “गहरे रणनीतिक विश्वास” पर टिका बताया। चार दशकों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली न्यूज़ीलैंड यात्रा उनके छह-दिवसीय इंडो-प्रशांत दौरे का समापन-चरण रही, जिसमें इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल रहे।
ज़ोर उल्लेखनीय रूप से समुद्र की ओर रहा। दोनों पक्षों ने इंडो-प्रशांत में समुद्री सहयोग का एक ढाँचा और एक वार्षिक “समुद्री सुरक्षा संवाद” स्थापित करने पर सहमति जताई; भारत ने इंडो-प्रशांत महासागर पहल के तहत न्यूज़ीलैंड द्वारा समुद्री सुरक्षा को प्राथमिक स्तंभ चुनने का स्वागत किया। इसके नीचे तीन रक्षा व्यवस्थाएँ हैं — भारत के रक्षा मंत्रालय और न्यूज़ीलैंड रक्षा बल के बीच एक समुद्री सहयोग व्यवस्था, नौवहन-चार्ट के संयुक्त निर्माण हेतु एक जल-सर्वेक्षण व्यवस्था, और दोनों नौसेनाओं को अनुमोदित गतिविधियों में एक-दूसरे की सुविधाएँ उपयोग करने देने वाली एक पारस्परिक साजो-सामान (लॉजिस्टिक्स) व्यवस्था।
रोडमैप का मूल्य यही है कि वह एक गर्मजोशी भरी यात्रा को एक कैलेंडर में बदल देता है — वार्षिक संवाद और स्थायी व्यवस्थाएँ, जो प्रतिनिधिमंडलों के लौट जाने के बाद भी काम करती रहती हैं।
सुरक्षा के साथ-साथ वाणिज्य भी चला: नेताओं ने 2030 तक वस्तुओं व सेवाओं में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना कर लगभग ₹35,000 करोड़ तक ले जाने का लक्ष्य रखा और एक प्रस्तावित मुक्त-व्यापार समझौते की प्रगति की समीक्षा की। ऑकलैंड के ये परिणाम तेज़ी से फैलते नक़्शे से जुड़ते हैं — 15 जुलाई से लागू होता भारत–यूके समझौता, अंतिम चरण में भारत–अमेरिका अंतरिम समझौता, और हस्ताक्षर की ओर बढ़ता भारत–यूरोपीय संघ समझौता।
रचनात्मक कार्य अब ढाँचे को सक्रिय करना है: पहला समुद्री सुरक्षा संवाद बुलाना, रक्षा व्यवस्थाओं को कर्मचारियों से लैस करना, और व्यापार-वार्ता को दोनों पक्षों के अनुकूल शर्तों पर पूरा करना। धैर्य से किया जाए, तो एक ऐतिहासिक पहली यात्रा एक स्थायी साझेदारी बनती है, महज़ एक दिन की सुर्खी नहीं।











