एक सदी से अधिक में सबसे सूखे जून में से एक के बाद, दक्षिण-पश्चिम मानसून ने जुलाई की शुरुआत में रफ़्तार पकड़ ली है, जिससे गाँव-देहात में राहत है — भले ही भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) को महीने की बारिश सामान्य से कुछ कम रहने की उम्मीद है। जुलाई मानसून का सबसे भीगा और भारत के वर्षा-आधारित खेतों के लिए सबसे निर्णायक दौर है।
जून में लगभग 99.5 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य से करीब 40% कम और 1901 के बाद के सबसे कम बारिश वाले जून में से एक रही; इससे खरीफ़ बुवाई पिछड़ गई थी। आईएमडी का जुलाई अनुमान बारिश को दीर्घकालिक औसत से कुछ नीचे रखता है, हालाँकि उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व, पूर्व-मध्य और पूर्वी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में सामान्य-से-अधिक वर्षा संभव है — और मानसून के फिर सक्रिय होने से संचयी बारिश सुधर रही है।
मानसून का गणित कुल बारिश जितना ही समय का भी है — एक मज़बूत, समान रूप से फैली जुलाई सूखे से शुरू हुए सीज़न को अब भी उबार सकती है।
एक नज़र में
- जून की बारिश: ~99.5 मिमी, सामान्य से करीब 40% कम (1901 के बाद सबसे कम में से एक)
- जुलाई अनुमान: कुल मिलाकर सामान्य से कुछ कम; कुछ क्षेत्रों में सामान्य-से-अधिक
- जुलाई क्यों अहम: सबसे भीगा महीना; धान, दलहन, तिलहन के लिए निर्णायक
- रुझान: बारिश और बुवाई में सुधार जारी
निकट-अवधि की चुनौती वास्तविक है — जलाशयों का स्तर, पेयजल आपूर्ति और बुवाई सभी जुलाई-अगस्त पर निर्भर हैं। केंद्र और राज्य की एजेंसियों के पास आकस्मिक योजनाएँ हैं — कम-अवधि की बीज-किस्मों से लेकर उन सलाहों तक, जो किसानों को उपलब्ध बारिश के अनुसार बुवाई का समय बदलने में मदद करती हैं।
रचनात्मक राह तैयारी को गति देना है: बीज और ऋण को संशोधित कैलेंडर से मिलाना, जलाशयों व सिंचाई को सूखे दौर पाटने के लिए तैयार रखना, और भारत के सघन मौसम-पूर्वानुमान तंत्र का उपयोग करना — ताकि धीमी शुरुआत एक संभालने योग्य सीज़न बने, न कि खोया हुआ।












