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जेल में बंद महिला, बच्चे को जन्म देने के लिए कोर्ट ने दी 6 महीने की बेल

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जेल में बंद महिला, बच्चे को जन्म देने के लिए कोर्ट ने दी 6 महीने की बेल

- मानवीय दृष्टिकोण के तहत कोर्ट ने दिया फैसला

by ब्लिट्ज़ इंडिया
December 20, 2024
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नागपुर। बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने जेल में बंद एक आरोपी गर्भवती महिला को 6 महीने की जमानत दी है। नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट में जेल में बंद इस महिला को मानवीय दृष्टिकोण के तहत जमानत मिली है। उसने अपनी डिलीवरी और शुरुआती देखभाल अवधि के लिए जमानत मांगी थी। कोर्ट ने उसे सशर्त जमानत दी, ताकि वह ठीक होने के बाद वापस हिरासत में आ सके।
जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के की सिंगल-जज बेंच ने यह फैसला दिया। बेंच ने कैदियों के लिए सम्मान और मानवीय विचारों के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि जेल की चारदीवारी में बच्चे को जन्म देने से मां और बच्चे दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
नागपुर बेंच की जस्टिस ने क्या कहा
कोर्ट ने कहा, ‘यह सच है कि सरकारी अस्पताल आवश्यक देखभाल प्रदान कर सकते हैं। प्रसव के दौरान जेल में माहौल मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य पर स्थायी मनोवैज्ञानिक और शारीरिक प्रभाव डाल सकता है।’ जस्टिस जोशी-फाल्के ने इस बात पर जोर दिया कि जेल में बच्चे को जन्म देने से उन्हें वह सम्मान और देखभाल नहीं मिल पाती, जिसकी वे हकदार हैं। जज ने कहा कि महिला को जेल के बाहर प्रसव की अनुमति देना संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है।
दो महीने की गर्भवती थी, तब हुई थी गिरफ्तार
गोंदिया की रहने वाली महिला को उसके पति के साथ नार्कोटिक्स अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था। उसे रेलवे पुलिस बल ने इस साल 30 अप्रैल को प्रतिबंधित सामान ले जाते हुए पकड़ा था। महिला जब पकड़ी गई थी, उस समय वह दो महीने की गर्भवती थी।
महिला ने याचिका में क्या कहा
महिला ने तर्क दिया कि प्रसव के समय उसे संभावित जटिलताओं के लक्षण दिख रहे थे और इसलिए मानवीय आधार पर, उसे अस्थायी जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए। उसने आगे कहा कि वह जेल में है, जो आपातकालीन चिकित्सा देखभाल प्रदान करने के लिए तैयार नहीं है। उसने प्रसव और प्रारंभिक देखभाल अवधि के लिए जमानत मांगी।
हाई कोर्ट ने कही यह बात
न्यायमूर्ति जोशी-फाल्के ने कहा कि मामले में प्रथम दृष्टया महिला की मांग सही है। सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के आलोक में, कुछ कारकों पर विचार करने की आवश्यकता है। याचिकाकर्ता की रिहाई उच्च सुरक्षा जोखिम पैदा नहीं करती है। नार्कोटिक्स अधिनियम की धारा 37 के तहत कठोरता होने के बावजूद जांच में कोई पूर्वाग्रह पैदा नहीं हुई। परिस्थितियों को देखते हुए, उसे अस्थायी जमानत पर रिहा करने के आवेदन पर मानवीय आधार पर विचार किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के ने 50,000 रुपये के निजी मुचलके और एक या अधिक जमानतदारों को पेश करने पर उसे रिहा करने का निर्देश दिया। अदालत ने दो सप्ताह की नकद सुरक्षा विकल्प की भी अनुमति दी। महिला को सबूतों से छेड़छाड़ करने या गवाहों को डराने-धमकाने से प्रतिबंधित किया गया है। उसे जांच अधिकारियों को एक फ़ोन नंबर और पता देने और अपनी जमानत अवधि के दौरान इसी तरह के अपराधों से बचने के लिए कहा गया।

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